377 /2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
टेढ़ी है लकीर
सीधी कोई तो करे।
बचा देह पाँव
सब चले जा रहे
रेख सीधी भी करे
कैसे कोई क्यों कहे
उल्लू सीधा हो निजी
कोई फिक्र क्यों करे !
होना चाहिए सही
सत्य सदियों ने कहा
कैसे सीधी हो लकीर
कहने करने से रहा
तप्त पानी को कोई
नहीं हाथों में भरे।
नजरन्दाजियों में
देश का हाल ये हुआ
उपदेश देते लीडरान
खोदते कुँआ
रहे कुर्सी ये सलामत
कोई भाड़ में गिरे।
शुभमस्तु !
28.07.2025●10.30 आ०मा०
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