369/2025
©व्यंग्यकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
जहाँ की और जिसकी बात कही जा रही है;वहाँ और उनकी सावन भादों ही नहीं बारहों मास हरियाली है। वहाँ कभी सूखा नहीं सुख ही देखा जाता है। वहाँ कभी अकाल नहीं, सकाल ही दिखता है। वहाँ पानी की नहीं , सोना - चाँदी की बरसात होती है।जब सोने - चाँदी की बरसात हो तो वहाँ जंगली घास नहीं उगती।वहाँ 'फल' दार पेड़ ही उगते हैं ;जो किसी मौसम विशेष में नहीं बारहों मास फलते हैं। जब जरूरत महसूस हुई,एक डाली को हिलाया ,तो 'फल' का नहीं ; 'फलों' का अंबार लग जाता है। उन 'फलों' को 'वह' और उनका दुलार खाता है। हर किसी को ये 'फल' नसीब नहीं होते।होते हैं उनको जो उनके करीब होते।
कुछ लोग कहते हैं कि इनकी तो चाल ही बड़ी टेढ़ी है।और जिसकी चाल टेढ़ी हो उसे लोग बदचलन कह दिया करते हैं। पर है किसी में साहस कि इन्हें कोई बदचलन कह सके ! ये तो आम आदमी को भी चरित्र का 'प्रमाणपत्र' देते हैं।यह अलग बात है कि वे कभी-कभी चरित्र भी माँग ;माँग क्या छीन भी लेते हैं।यह 'राज' ही ऐसा है,जिसके कण - कण में पैसा है।कोई इसके कुर्ते में घुसकर तो देखे ! वहाँ वह क्या कुछ नहीं है,जिसकी उसने कभी पूर्व कल्पना भी नहीं की थी।
सावन कृष्ण अमावस्या को लोग हरियाली मावस मनाते हैं। एक दिन स्न्नान दान और पूजा पाठ करके अपने मन की संतुष्टि कर लेते हैं।पर राज की गद्दे और गद्दी पर पसरे और विराजमान जन किस क्षण हरियाली में मदमस्त नहीं हो जाते हैं ?वे हरियाली पूर्णिमा का साज सजाते हैं। जैसे कोई पेड़ खाद को चूस कर पनपता और बढ़ता है, वैसे ही राजगद्दी नसीन 'आम'को चूस कर उसे खाद की तरह निचोड़ लेता है। उसे जमीन का स्वामी कहकर जमींदार बताया जाता है,उसी के स्वेद और रक्त का खाद बना स्वाद लिया जाता है। वह बेचारा फिर भी मूक बना चुसा जाता है।किंचित मात्र अपना सिर भी नहीं हिलाता है।
सावन के अंधे को बारह मास हरा ही हरा दिखाई देता है।यह बात सही हो या न हो ;परंतु ऐसा लगता है कि यह कहावत इन्हीं को देखकर बनाई गई होगी। कभी गद्दी पर तो कभी गद्दे पर। गद्द से सदा गदगद रहना ही इनकी गारंटी है। गद्द पद ये कहाँ से कहाँ पहुँच जायँ ; कुछ भी कहा नहीं जा सकता।रातों रात राज्यपाल ! रातों रात महीपाल ! कोई भी नहीं उठा सकता सवाल।भले विपक्ष कर ले कितना ही बवाल ! पर होना ही नहीं है इसका कोई भी हवाल। जब उनकी नजर में हलाल तो सबके लिए भी होना है उसे हलाल। फिरता रहे कोई किसी पेड़ की डाल -डाल ,पर उन्हें तो होना ही है 'हरियाली' से मालामाल।
हरियाली केवल हरे - हरे पत्तों की ही नहीं होती। हरियाली नोटों और संपत्ति की भी होती है। वे उसी हरियाली से हरियाये हुए हैं। कोई कोई तो 'इस' हरियाली को तरस रहे हैं ;परंतु उन पर तो हरे - हरे नोट बरस रहे हैं।वे गरज -गरज कर लरज रहे हैं और सरस रहे हैं। कोई कुछ कहने और करने वाला नहीं है। वे जो करें ,वे जो कहें ; सब कुछ सही है। उनकी तो ये सकल मही है।लिखने वाले ने यह झूठ नहीं कही है।बने तो बने किसी के दिमाग का दही है।
हरी - हरी हरियाली के अनेक रूप हैं।किसी को आँखों की हरियाली चाहिए ;किसी को पाँखों की ,जिससे वे ऊँचे से ऊँचे आसमान में उड़ सकें। इतना अवश्य है कि हरियाली सबको अच्छी लगती है। इसीलिए उसको सेलीब्रेट किया जाता है। लेकिन जिसकी बारहों मास हरियाली हो,उसकी तो पौ बारह ही हैं। उनका सिर ओखली में नहीं; मुँह कढ़ाई में अवश्य है ।
शुभमस्तु !
24.07.2025●11.00 आ०मा०
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