शनिवार, 19 जुलाई 2025

साहित्य का फंगस [ व्यंग्य ]

 354/2025 


         

©व्यंग्यकार

डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

आदमी एक बुद्धिमान नहीं, अति बुद्धिमान जंतु है। जंतु शब्द पढ़कर चौंकिए मत,यह भी सत्य है कि वह पशु,पक्षी, कीट,पतंगों, मछली,मेढक की तरह ही जंतु ही है। यदि उसे अपने को जंतु समझने में कोई आपत्ति हो तो कोई क्या कर सकता है। यदि उसे मेरी बात का विश्वास न हो तो जंतु विज्ञान की किसी अच्छी सी किताब का अध्ययन कर सकता है और मेरे कथन की पुष्टि कर सकता है। मुद्दे की बात यह है कि वह एक 'अति बुद्धिमान ' जीव है।उसने अपनी इस अति बुद्धिमत्ता का सदुपयोग भी किया है और दुरुपयोग भी किया है। अपनी 'अति बौद्धिकता' की अनवरत प्रगति भी हो रही है। प्रगति इस अर्थ में कि उसने जीवन के हर पहलू को सिक्कों से नहीं ,नोटों से बल्कि ये कहें कि सोने- चाँदी से तोला है; तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। और तो और उसे बात करने का भी पैसा चाहिए। यदि मेरी बात का विश्वास न हो तो किसी भी डॉक्टर, वकील ,दलाल, क्लर्क और कचहरी की ईंट- ईंट से संपर्क कर देखिए।

 दुनिया में प्रत्येक चीज को धन की तराजू में नहीं तोला जा सकता।कुछ चीजें मानव मात्र के कल्याण के लिए बनी हैं। फूल खिलते हैं,अपनी सुगंध बिखेरते हैं,पर किसी से मूल्य नहीं माँगते।हवा बहती है, जीव -जंतु और सृष्टि को जीवन देती है,पर अपना मूल्य नहीं माँगती।धूप और प्रकाश निःशुल्क सेवा करते हैं। धरती और आकाश बिना वेतन अपने दायित्व का निर्वाह अहर्निश कर रहे हैं।इसी प्रकार साहित्य का सृजन भी जन कल्याण के लिए हुआ है,किन्तु इस आदमी नामक प्राणी ने उसे भी धनार्जन का साधन बना लिया है। ये ठीक है कि किताब बिके तो उसके मूल्य का भुगतान भी करना ही है।किंतु किताब को इस प्रकार चालाकी और शातिरी से छापा जाए कि आदमी आदमी का शोषण करके धन कमाए,यह सर्वथा अनुचित है।

  छपास की महत्त्वाकांक्षा की नब्ज पकड़ने वाले नीम हकीमों ने कुछ ऐसा बीज वपन किया है कि रजिस्ट्रेशन के नाम पर पाँच -पाँच सौ, एक -एक हजार या जो भी उन्हें उचित लगे; धन मँगाकर साझा संकलन निकाल कर नव कवियों का शोषण कर रहे हैं। सौ लोगों से एक - एक हजार मिल गया, सौ प्रतियों में बीस - पच्चीस हजार खर्च हुए, छ:-सात हजार डाक व्यय में लगे ।फिर भी साठ हजार तो कहीं गए नहीं हैं। इससे बढ़िया धंधा भला और क्या हो सकता है। व्हाट्सएप पर एक रसीला,भड़कीला, चमकीला मैसेज टाइप करो और बिना किसी हर्रा फिटकरी के हजार पाँच सौ को भेज दो । सौ तो कहीं गए नहीं हैं। धंधा अच्छा है,स्वस्थ है,स्वच्छ है। आयकर रहित है। हर प्रेषक मोहित है क्योंकि साथ में एक रंग -बिरंगा प्रमाणपत्र और प्रतीक चिह्न भी तो है।जो घर के शो केस की शोभा बढ़ाएगा और लड़के की शादी वालों के लिए इज्जत का मुकाम भी सजाएगा।

  भारत से लेकर नेपाल तक यह साहित्यिक धंधा जोरों पर है।साझा संग्रहों की बाढ़ नहीं ;सुनामी आई हुई है।जो रह गया सो रह गया।बह गया सो बह गया। कुछ भी हो, प्रमाणपत्र पाकर बड़े साहित्यकारों की सूची में नाम भी लिख गया। आज के युग में यदि सूर,कबीर,तुलसी,बिहारी,रसखान,रहीम,घनानंद,प्रसाद ,पंत, निराला, महादेवी वर्मा यदि रहे होते तो अपना भाग्य कोस रहे होते।जिन्हें अपने से ही अवकाश नहीं,वह इन धंधों में क्यों पड़े? आज प्रचार और विज्ञापन का युग है,बिना इसके कोई साहित्यकार प्रख्यात नहीं हो पाता।लोग अवसर का लाभ उठा रहे हैं और अपने नाम में चार -चार नहीं ,आठ -आठ चाँद लगा रहे हैं। दस बीस साझा संकलनों में नाम छपने के बाद वे बड़े सहित्यकार बन जा रहे हैं। स्वयं घोषित और स्वयं पोषित ।और अब तो परिचय में बीस साझा संकलनों का नाम भी छपने लगा है। अब वे बड़े कवि हैं। उनकी साहित्य के गगन में ऊँची छवि है।अब वे चाँद - तारे नहीं , रवि हैं। समझ में नहीं आता कि धंधे में सहित्य है अथवा सहित्य में धंधा पनप गया है। मैं उसे सहित्य का फंगस कहूं तो किसी को क्या फर्क पड़ता है। फंगस तो फंगस ही रहेगा न ! 

  इस तथ्य से आप अनभिज्ञ नहीं होंगे कि फंगस में हरित लवक नहीं होता। इसी प्रकार धंधेखोरी से छपास पूरी करने के महत्त्वाकांक्षियों के साहित्य में भी हरीतिमा नहीं होती। कभी कभी वह स्व-चोरित भी होता है।पर छापने वाले को क्या ,पकड़ा जाएगा तो स्वयं भुगतेगा।उसका धंधा पक्का हो गया।यह तो वह स्व- घोषणा में ही लिखवा देता है,कि इसका सम्पूर्ण दायित्व संपादक का नहीं,लेखक का होगा। बरसात हो रही है,दादुर टर्रा रहे हैं। इधर इस लेख का लेखक टर्रा रहा है, पर क्या कर सकता है? धंधा है फल- फूल रहा है। मनमर्जी की सरकार है। किसी के रोकने- टोकने की क्या दरकार है? आज जमाना ही ऐसे बरसातियों का है,जो बराबर बरस रहे हैं और बरस -बरस कर हर्ष रहे हैं और जो इस धंधे से दूर हैं ,वे तरस नहीं रहे हैं। वे युग की वास्तविकता के उत्कर्ष रहे हैं।

 शुभमस्तु ! 

 19.07.2025● 3.15 प०मा० 


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