सोमवार, 7 अगस्त 2023

सोच संकीर्ण न कर! ● [ गीतिका ]

 336/2023

 

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●©शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बड़ा  धर्म से देश, मनुज-व्यवहार बड़ा।

मात्र  आवरण वेश,सदा उपकार  बड़ा।।


छोड़ रूढ़ता मूढ़, सोच संकीर्ण न कर,

क्यों कुपंथ   आरूढ़,न हो गद्दार  बड़ा।


मन में तेरे मैल, अहित करता जन का,

विस्मृत अपनी गैल,करे व्यभिचार बड़ा।


करनी का परिणाम,सभी को मिलता है,

गति का कर्म प्रमाण,निरत आचार बड़ा।


बनें न रावण कंस,विनाशक अपने  ही,

अपने ही कर ध्वंस,ज्वलित अंगार बड़ा।


सब अपने में लीन,स्वार्थ के सागर   हैं,

लेते सब  कुछ छीन,छली संसार  बड़ा।


'शुभम्' सुदृढ़  आधार,बनाना है  अपना,

प्रभु  का  नाम उचार,मधुर उद्गार  बड़ा।


●शुभमस्तु !


07.08.2023◆6.15आरोहणम् मार्तण्डस्य।

बड़ा धर्म से देश ● [सजल]

 335/2023

      

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●समांत: आर।

●पदांत : बड़ा।

●मात्राभार : 11+11=22.

●मात्रा पतन :शून्य।

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●©शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बड़ा  धर्म से देश, मनुज-व्यवहार बड़ा।

मात्र  आवरण वेश,सदा उपकार  बड़ा।।


छोड़ रूढ़ता मूढ़, सोच संकीर्ण न कर,

क्यों कुपंथ   आरूढ़,न हो गद्दार  बड़ा।


मन में तेरे मैल, अहित करता जन का,

विस्मृत अपनी गैल,करे व्यभिचार बड़ा।


करनी का परिणाम,सभी को मिलता है,

गति का कर्म प्रमाण,निरत आचार बड़ा।


बनें न रावण कंस,विनाशक अपने  ही,

अपने ही कर ध्वंस,ज्वलित अंगार बड़ा।


सब अपने में लीन,स्वार्थ के सागर   हैं,

लेते सब  कुछ छीन,छली संसार  बड़ा।


'शुभम्' सुदृढ़  आधार,बनाना है  अपना,

प्रभु  का  नाम उचार,मधुर उद्गार  बड़ा।


●शुभमस्तु !


07.08.2023◆6.15आरोहणम् मार्तण्डस्य।

रविवार, 6 अगस्त 2023

सार्थकता जीवन की ● [अतुकान्तिका]

 334/2023


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●©शब्दकार

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जिस्म

जिंदगी

जर्रा -जर्रा

जर्जर

ज़रा - ज़रा।


जिंदादिल ही

जिया जिंदगी

जिसने 

ज़ख्म सिया,

जलता एक दिया।


कुत्ते भी

भर लेते

अपने पेट,

मस्त सूकर

कीचड़ में,

नर जीवन

नहीं जुआ।


करता नहीं

जनक जननी की

सेवा ,मान न पूजा,

देशभक्ति गुरु मान

न जिसमें

वह तो ढोर मुआ।


'शुभम्' सार्थक

जीवन कर ले

दुर्लभ मानव देह,

उड़ जाए

जिस क्षण

वह पंक्षी

रिक्त बने 

ये गेह,

हुआ या 

नहीं हुआ!


●शुभमस्तु !


04.08.2023◆3.30आ०मा०

हलधर को छतरी नहीं ● [ दोहा ]

 333/2023

 

[मेघ,हलधर,हरियाली,छतरी,नाव]

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●© शब्दकार

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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          ● सब में एक ●

सघन मेघ मँडरा रहे,अंबर में    चहुँ  ओर।

देख  छतों  पर नाचते, मदमाते  बहु   मोर।।

प्यासी धरती  जेठ  की ,पीती है   जलबिंदु।

नभ आच्छादित मेघ बहु,छिपा मौन हो इंदु।।


पावस  में  टर-टर करें, दादुर दल   तालाब।

हलधर हर्षित गाँव में,सकें न हिय  में  दाब।।

जीवन-संगिनि तरु तले,प्रातराश रख शीश।

आई हलधर पास में,भला करें   जगदीश।।


पावन पावस मास में,शुभ हरियाली तीज।

आई  है वरदान  को,कृषक बो  रहे  बीज।।

तरु- हरियाली देखकर, हर्षित  होते   नेत्र।

यहाँ  वहाँ  अंकुर  हरे,उगे बाग  वन   क्षेत्र।।


झीनी - झीनी  झर रहीं,बूँदें नभ  चहुँ  ओर।

छतरी थामी हाथ में,दिखे न नभ का छोर।।

छतरी तानी  शीश  पर, बस्ता  लादा  पीठ।

बाला  विद्यालय  चली,लगे न लेश  कुदीठ।।


खेत लबालब हैं  भरे, उमड़ रहा  उर चाव।

बालक   हर्षित  दौड़ते, तैराने को    नाव।।

नाव पुरानी देह की,कब तक   करती पार।

यौवन    बीता जा रहा,जर्जर आयु   सवार।।

    

         ● एक में सब ●

हलधर को छतरी नहीं,

                        हरियाली से    चाव।

मेघ     उमड़ते     देखकर,

                             चला खेत ले   नाव।।


● शुभमस्तु !


02.08.2023◆6.30 आ०मा०

मंगलवार, 1 अगस्त 2023

कब लौटें प्रिय धाम! ● [ गीत ]

 331/2023

  

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● © शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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आँखें भर -भर

दुखी विरहिणी

कब लौटें प्रिय धाम।


गर्म रेत के

दिखते टीले

दूर -दूर तक तप्त।

विधना ने क्या

लिख डाली लिपि

होती मैं अभिशप्त।।


ऊँटों के ये

सभी कारवाँ

जाते हैं अविराम।


संभव हो ये

किसी ऊँट पर

आते हों प्रिय मोर।

बीत गई हैं

रातें काली

कब होगी शुभ भोर।।


जपते -जपते 

नाम तुम्हारा

हुई सुबह से शाम।


दिखता एक न

परिचित पंथी

जो प्रिय को जाने।

खंडित आशा 

धूल उड़ाती

पाए न   परवाने।।


बरसाने की

राधा जैसी

अँखियातुर घनश्याम।


●शुभमस्तु !


01.08.2023◆12.30 प०मा०

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साधन भक्षित साधना ● [ कुंडलिया ]

 332/2023

 

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●© शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                        -1-

साधन   ज्यों-ज्यों  बढ़ रहे,हुई साधना   न्यून।

तन-मन में आलस बढ़ा,क्षीण शक्ति हो क्यूँ न!

क्षीण  शक्ति  हो क्यूँ  न,जीभ की   धारें  पैनी।

नरक  गमन  की ओर, लगाए मनुज  नसैनी।।

'शुभम्' ढोंग  के  खेल,खेलता नर    आराधन।

चलें  हवाई  रेल,  बढ़े   जब भौतिक  साधन।।


                        -2-

साधन    आवागमन  के,बढ़ते जाते    नित्य।

चार कदम चलता नहीं, पैदल क्या औचित्य।।

पैदल क्या औचित्य, शाक-सब्जी   जब लाए।

स्कूटी    आरूढ़ ,  कार   बाइक   पर   जाए।।

'शुभम्'प्रतिष्ठा मान, यही जन के आच्छादन।

दिखा खोखली शान,बढ़े हैं भौतिक   साधन।।


                        -3-

साधन की भरमार है, भर-भर बैग  किताब।

लद्दू गर्दभ - सा  लदा,विद्या जी    की  आब।।

विद्या जी   की  आब,  बसें पीले  रँग  वाली।

टाई,  जूते , सूट,   सभी  उसने  बनवा   ली।।

'शुभम्'  उच्च  प्रासाद, भले वे पढ़ते  पाठ न।

ए. सी.सज्जित कक्ष, आज के शिक्षा-साधन।।


                        -4-

साधन सब घर में भरे,टी वी, फ्रिज़ या कार।

ए. सी. सज्जित कक्ष हैं,लाए स्वर्ग   उतार।। 

लाए   स्वर्ग   उतार,  बना रोगालय     पूरा।

घर   भर  है   बीमार ,  दवाघर  नहीं   अधूरा।।

'शुभम्'सुखों का भोग,नहीं किंचित अपनापन।

रोग, रोग  बस  रोग, दे  रहे भौतिक  साधन।।


                        -5-

साधन   भक्षित   साधना, आडंबर   भरपूर।

तिलक, माल, चंदन सभी,हस्त  कलावा नूर।।

हस्त कलावा नूर, भक्ति का भाव  उड़न  छू।

चर्बी  से  हो   होम,महकती कैसी   ये    बू।।

'शुभम्' मूँछ पर ताव,लगाता पी गैया - थन।

कनफोड़ू विस्तार,यंत्र ध्वनि का नव साधन।।


●शुभमस्तु !


01.08.2023◆ 3.00 प०मा०

एक गधे ने बदला नाम! ● [बालगीत ]

 330/2023


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● © शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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एक   गधे   ने   बदला  नाम।

कहता मुझको  करो सलाम।।


सब मुझको अब कहना 'शेर'।

सुधरो  करो न  किंचित  देर।।

बदलो मुख में  जमा  कलाम।

एक गधे   ने   बदला   नाम।।


जंगल  का   मैं   राजा  एक।

काम करूँगा  सब मैं   नेक।।

मैं  ही  रावण मैं   ही    राम।

एक   गधे  ने बदला    नाम।।


गधा   कहेगा  जो  भी  मित्र।

होगा  उसका    बुरा   चरित्र।।

चाहेगा      करना     बदनाम।

एक  गधे  ने   बदला   नाम।।


बदल  जायँगे   अब   पर्याय।

कहना  खोता   है   अन्याय।।

गर्दभ के  भी  करूँ   न काम।

एक  गधे  ने   बदला    नाम।।


एक    बनाएँ      मेरी    माँद।

वहीं  सुनूँगा  हर    फ़रियाद।।

नहीं  घूमने   का   हो    झाम।

एक  गधे  ने   बदला    नाम।।


'शुभम्' सभी  पशु आएँ पास।

सबको    देता   हूँ   विश्वास।।

प्रातः से   लेकर    हर   शाम।

एक  गधे  ने  बदला    नाम।।


●शुभमस्तु !


01.08.2023◆11.30आ०मा०

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...