शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

अनजान [ कुंडलिया]

 659/2025


                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

बालक   मैं   अनजान   हूँ,हे प्रभु जी    श्रीराम।

कृपा  करो इस दास पर,भजूँ   आपका  नाम।।

भजूँ    आपका   नाम,  बुद्धि   प्रभु  ऐसी  देना।

करूँ    हितैषी   काम, नाव   मेरी   नित   खेना।।

'शुभम्' शरण   में आज,पिता-माता  हो पालक।

महिमा  से   अनजान, आपका     नन्हा बालक।।


                         -2-

आया   था    संसार    में,   सबसे    मैं    अनजान।

मिले  जनक-जननी  सभी,  गुरुजन  श्रेष्ठ महान।।

गुरुजन    श्रेष्ठ       महान,    मित्र   सम्बंधी   सारे।

प्रिय    पत्नी   संतान, प्रणय  सह  नेह      दुलारे।।

'शुभम्' जगत  का  राग,   रंग  जब  मुझको भाया।

अपनाया      संसार ,  जन्म    ले   जग  में आया।।


                           -3-

लेना    मत   अनजान   से, मित्र  कभी  आहार।

पथ   में   हो   या   गेह   में,  पावन  हो आचार।।

पावन     हो    आचार,  किसी  से क्या है आशा।

भरे     स्वार्थ    से  लोग, न   पाले  कभी दुराशा।।

'शुभम्' आप   निज  नाव,सदा जगती में   खेना।

सगा   न  कोई  बंधु,  किसी  से  कुछ मत  लेना।।


                         -4-

मिलते    राही     राह   में, सत पथ से   अनजान।

पता  नहीं    होता    जिन्हें,  निज गंतव्य   महान।।

निज        गंतव्य     महान,    भटकते भूलभुलैया।

गिरते       हैं      जब     गर्त,   चीखते  दैया-दैया।।

'शुभम्'     वहीं   बहु  फूल,बाग में शोभन खिलते।

जिन्हें    राह    का   ज्ञान, अल्पतम   ऐसे मिलते।।


                         -5-

करता    लालच   आदमी ,  बना  हुआ   अनजान।

खा    जाता    धोखा    वही,  समझे  स्वयं  महान।।

समझे      स्वयं    महान, राह  में  भटका   रहता ।

बिना   लिए   पतवार,   खिवैया   सरि में  बहता।।

'शुभम्'    भरे   कुविचार,   गर्त में  जा गिर मरता।

मन   को      रखे    सुधार, वही   पथ  पूरा  करता।।


शुभमस्तु !


30.10.2025● 8.45प०मा०

                      ●●●

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

चुँधियाता सोना हमें रहा है [ नवगीत ]

 658/2025


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


युग- युग से

चुँधियाता 

सोना हमें रहा है।


मरते दम तक

साँपों ने

है स्वर्ण सहेजा

मिथ्या गाड़

प्रतिष्ठा का ध्वज

 रहा तनेजा

अंध बुद्धि के

चपल करों ने

जिसे गहा है।


कितने आए

चले गए

रहा रोना का रोना

ला न सका

मुस्कान

कभी

यह पीला  सोना

जिसने भी

पाया सोना

वह सदा दहा है।


साँपों से 

भयभीत मनुज

पर डरा न सोना

अशुभ हुआ

मानव को

उसका पाना-खोना

प्रतिमा गहनों

ईंटों से चुन

स्वर्ण लहा है।


शुभमस्तु !


30.10.2025●12.15 प०मा०

                   ●●●

ज्यों चाँदी-सोना [ नवगीत ]

 657/2025


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


धनिकों की हर चीज

हमें लगती है मँहगी

ज्यों चाँदी-सोना।


खाते या कि

पहनते  होंगे

पता नहीं

दीवारों में

चुनवाते हों

वे लुका कहीं

आम आदमी

को सपना है

उसका होना।


भाव खा रहे

ऊँचे-ऊँचे

क्या  बतलाएँ

तोला भर

लाखों से ऊपर

हमें सताएँ

समझ न पाएँ

दुल्हनिया का

रोना -धोना।


नारी- हठ के

नहीं सामने

कोई टिकता

उसे चाहिए 

केवल सोना

नहीं न सिकता

तभी पड़ेंगीं

सात भवरियाँ

होगा  गौना।


शुभमस्तु !


30.10.2025 ● 11.45 आ०मा०

                   ●●●

सोना और साँप [ अतुकांतिका ]

 656/2025


       


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


साँपों  का

 सोने से सम्बंध

आजकल से नहीं

युग-युग से है,

सनातन है।


साँपों को सोने से प्यार है

सोना रक्षित और

साँप रक्षक हैं,

इसके लिए वे 

कुछ भी कर सकते हैं,

मार  और मर सकते हैं,

किंतु सोना 

 नहीं तज सकते हैं।


धरती में गाड़े हुए

बड़े-बड़े  स्वर्ण -खजाने

बहुत ही पुराने

सर्प-रक्षित हैं।


सर्पों के लिए

सोने की कोई

उपयोगिता नहीं,

मात्र रक्षा का दायित्व है,

आदमी सर्प की आत्मा में

उसका निर्वाह कर रहा है।


साँप और सोना

आज भी हैं, 

किसी का सोने से

पेट नहीं भरा अब तक,

भूख भी नहीं मिटी,

गड़ा रह गया सोना

एक रहस्य की तरह

ज़मीदोज़,

और साँप फन फैलाए

फुफकार रहे हैं।


शुभमस्तु !


29.10.2025 ● 9.00प०मा०

                      ●●●

मुझे भाता नहीं है [ नवगीत ]

 655/2025


         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लीक पर चलना

मुझे भाता नहीं है।


धार के ही

साथ 

मुर्दे  बहा करते

प्राण जिनमें

चीर धारा 

कर सँभलते

चेतना का

बोध जिसमें

लोरियाँ गाता नहीं है।


स्वयं घोषित

सूर्य को 

मैंने न माना

यों सितारों को

सभी 

मैं  खूब जाना

आकाश है

विस्तृत बड़ा 

मगर ताता नहीं है।


अस्मिता को

 तुम चुनौती

दे रहे हो

और निज

पतवार किश्ती

खे रहो हो

पर 'शुभम्'

अपने सुपथ 

गंतव्य निज पाता यहीं है।


शुभमस्तु !


28.10.2025●11.30 आ०मा०

                     ●●●

अन्याय के पर्याय हैं! [ नवगीत ]

 654/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पूर्वाग्रहों से

ग्रसित जन

अन्याय के पर्याय हैं।


व्यक्ति की 

छवि को

विकृत करना जिन्हें है

अग्रणी 

जो चल सके

वही भरना  उन्हें  है

धारणा में

धूल धूसरता

कुपित अध्याय है।


मारते

दीवाल में

जो सींग हैं

शून्य में

लंबी 

लगाते पींग हैं

और कहते हैं

स्वयं को

वे दूध देती  गाय हैं।


हाथियों की

गैल को 

जो रोकता  है

मस्तमौला 

चाल को

जो टोकता है

टूट जाती

थूथनी

करते नहीं जो न्याय हैं।


शुभमस्तु !


28.10.2025● 11.00 आ०मा०

                       ●●●

प्यार में खोई युवा जोड़ी [ गीत ]

 653/2025


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्यार में खोई 

युवा जोड़ी

एकांत पल है।


फूल झरते 

पेड़ से 

अद्भुत समा है

घास में यों

प्यार का

आसन जमा है

एक दूजे 

के बिना 

पड़ती न कल है।


बेखबर 

जग से

स्वयं से हो गए हैं

पलक 

चारों बन्द हैं

ज्यों सो गए हैं

जिंदगी के

रूप का

ये भी अमल है।


साथ जीने

साथ मरने 

की कसम ले

बढ़ चले

उस राह पर

प्रण की रसम ले

बसता

हृदय में प्यार 

निर्मल गंग जल है।


शुभमस्तु !


28.10.2025●5.30 आ०मा०

                  ●●●

सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

सब फटाफट में मगन हैं! [ नवगीत ]

 652/2025



 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 सब फटाफट में

 मगन हैं

वक्त किसके पास है!


ब्रेन में

कम्प्यूटरों की

फिट हुई हैं कुंजियाँ

ब्रेन तो

ठंडा पड़ा है

टनटनाती  पंजियाँ

आदमी है 

दास एकल

ब्रेन खाता घास है।


मारकर झट टंगड़ी

निकलूँ

सभी से अग्र मैं

और पिएं

छाछ पानी 

दिव्य घृत का अर्क मैं

नीति झोंकी

भाड़ में सब

अर्थ से हर आस है।


पत्नी नहीं 

पति की रखे पत

अय्याश से अय्याशियाँ

सुत-सुता को

चाहिए बस

अर्थ   से   शाबाशियाँ

देह से 

आए पसीना

उसको नहीं अब रास है।


शुभमस्तु !


27.10.2025●3.00प०मा०

                    ●●●

पढ़ते थे किताबें प्रेम से [ नवगीत ]

 651/2025


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पढ़ते थे

किताबें प्रेम से

वे जन विदा क्यों हो गए?


आदमी का

आलसीपन

नित्य ही  बढ़ता   गया

वह डिजीटल

के लिए

मरु  शृंग पर चढ़ता गया

व्यक्ति श्रम से

यों निरंतर

श्रम जुदा हो सो गए !


कौन

जिम्मेदार है

अब सत्य कहने के लिए

गूगली 

हर बात सच है

अब तथ्य  चुनने के लिए

धूल खातीं

पोथियाँ हैं

जो मित्र थे सब खो गए।


हो सकें बच्चे

अगर पैदा

डिजीटल ही करो

क्यों

 फिजीकल की फ़िकर में

रात अब काली करो

कुंजीपटल की

कुंजियों से

ब्रेन सबके  धो गए।


शुभमस्तु !


27.10.2025●2.15 प०मा०

                  ●●●

बैलगाड़ी का जमाना [ नवगीत ]

 650/2025


           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बैलगाड़ी का

जमाना

अब नहीं है।


चक्र

चरितों का

चपल गति से चला है

नित्य

नैतिक अर्क

तेजी से  ढला  है 

लालसा

धन की बढ़ी

रम ही बही है।


बैंक वैभव

सब डिजीटल

हो गया है

आज 

रिश्तों का समंदर

सो गया है

धर्म के नारे

लगे

क्या धर्म भी है?


खोखले भाषण

सभी

उपदेश झूठे

नियम या 

कानून भी

सब भग्न रूठे

वक्ष में

इंसान के

क्या मर्म भी है?


शुभमस्तु !


27.10.2025●1.30 प०मा०

                 ●●●

मनस कभी तेरा उचटे [ गीतिका ]

 649/2025


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 मनस      कभी        तेरा     उचटे।

रहे       केंद्र     पर     नित्य    डटे।।


बढ़े    परस्पर      प्रिय       संवाद,

मेल      एकता    से    न        हटे।


रीति        सनातन   भंग     न   हो,

उचित  नहीं      मनुजात        बटे।


कर्म      प्रधान       रहे       जीवन,

रहें      मनुज  से     मनुज     सटे।


मन      में  हो      संकल्प     प्रबल,

रहें       जगत      में      छटे - छटे।


एक        रहें        कथनी -  करनी,

पल    भर    को  मन    नहीं  घटे।


'शुभम्'  अहं     से    जो     है   दूर,

मानवता        से       नहीं      कटे।


शुभमस्तु !


27.10.2025●7.15 आ०मा०

                 ●●●

रीति सनातन भंग न हो [ सजल ]

 648/2025


         

समांत        : अटे

पदांत         : अपदांत

मात्राभार     : 14.

मात्रा पतन   :शून्य.


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 मनस      कभी        तेरा     उचटे।

रहे       केंद्र     पर     नित्य    डटे।।


बढ़े    परस्पर      प्रिय       संवाद।

मेल      एकता    से    न        हटे।।


रीति        सनातन   भंग     न   हो।

उचित  नहीं      मनुजात        बटे।।


कर्म      प्रधान       रहे       जीवन।

रहें      मनुज  से     मनुज     सटे।।


मन      में  हो      संकल्प     प्रबल।

रहें       जगत      में      छटे - छटे।।


एक        रहें        कथनी -  करनी।

पल    भर    को  मन    नहीं  घटे।।


'शुभम्'  अहं     से    जो     है   दूर।

मानवता        से       नहीं      कटे।।


शुभमस्तु !


27.10.2025●7.15 आ०मा०

                 ●●●

भेड़ों के रेवड़ को कुत्ते घेर खड़े [ नवगीत ]

 647/2025



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भेड़ों के रेवड़ को

कुत्ते

घेर खड़े हैं।


जो वे कहें

वही तुम करना

लीक न छोड़ें

दाना वहीं भरा

कूपों में

रुख मत मोड़ें

हाँक बड़ी

मजबूत

लगाते वहीं अड़े हैं।


दाना ही तो

लक्ष्य

मुफ्त का पाना इनको

 मूँद  आँख

सिर के बल चलतीं

जान न छल को

पैनाये निज 

दंत

पहरुए बड़े कड़े हैं।


उच्चासन आसीन

श्वान के

दल बल भारी

बाँटें दाना 

मुफ़्त

मेष दल की लाचारी

लेबल 

सबके अलग

भक्ष्य में बढ़े -चढ़े हैं।


शुभमस्तु !


26.10.2025●3.45 प०मा०

                     ●●●

एक गधे की कीमत! [ नवगीत ]

 646/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक गधे की 

कीमत

मित्रो तुम क्या जानो ?


एक नहीं

दो तीन लाख में

गर्दभ आते

दूध दे रही

भैंस गाय

वाले शरमाते

गधे हुए

अनमोल

सत्य यह मेरी मानो।


आज गधे 

ऊपर हैं

नीचे और सभी हैं

अश्व हिनहिना रहे

अस्तबल

बड़ी गमी हैं

कौन पूछता

मेष अजा को

बड़ी न तानो।


समय-समय  की

बात

फिरें घूरे के भी  दिन

गधे हुए

सिरमौर

नहीं कर इतनी किनकिन

रोल्स-रॉयस बोट टेल का

स्वाद

सुना क्या अपने कानों?


शुभमस्तु !


26.10.2025●3.00प०मा०

               ●●●

दलहनों के खेत में आलू [ नवगीत ]

 645/2025


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दलहनों के

खेत में

आलू खड़ा है।


खिलखिलाती

पीत सरसों

अब नहीं है

झूमते गोधूम

मकई

भी कहीं हैं?

प्लेट में

भल्ला सजा

ना दधिबड़ा है।


गनगनाती

गाजरें 

मूली न शलजम

नाचते

वे चणक

या मटरें

न हरदम

जिधर देखो

आलुओं का

ध्वज गड़ा है।


नाचती 

अरहर  न रहरह

खेत में अब

बाजरे की

कलगियाँ

करतीं न करतब

सघन 

छाई धुंध में

आलू  पड़ा है।


शुभमस्तु !


26.10.2025●2.45प०मा०

कौन नहीं सुख चाहता! [ दोहा ]

 644/2025

  

      

        [सुख,दुख,मिलन,विरह,भाव]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                   सब में एक

कौन     नहीं   सुख   चाहता,जनहंता या   चोर।

परपीड़क   के   मन बसा,  दुखद भाव पुरजोर।।

सुख-दुख   हैं   दिनरात-से, चले निरंतर   चक्र।

कभी  दुग्धवत  दिवस  है,कभी तमस का   वक्र।।


कभी    किसी भी जीव  को,दुख मत देना  मित्र।

कर्मों    से     तेरे    खुले,    दूषित    दृष्ट चरित्र।।

दुख दोगे  दुख  ही मिले,अटल सत्य यह   जान।

बोए     बीज    बबूल    के ,  उगे   शूल बागान।।


मिलन - विरह   दो   रंग हैं,  जीवन के दो सत्य।

सदा   नहीं   समता   रहे,अटल जगत का तथ्य।।

प्रणय - मिलन की रात को,कौन भूलता आज।

खुले   नया  अध्याय  भी,सजे शीश पर   ताज।।


पिया   मिलन   के बाद  में,नहीं विरह की रात।

काटे   भी   कटती   नहीं ,याद  करे हर बात।।

प्रोषितपतिका  के  लिए, दुसह विरह की रात।

नहीं   दिवस   में   चैन  है,तप्त  सदा ही गात।।


सदा भाव     में   ईश का, होता  अटल  निवास।

अटकी   है   सद्भक्त   की,  वहीं भक्ति की श्वास।।

भाव बिना भगवान   भी,  कभी  न  मिलते  मीत।

शबरी    ने    सद्भाव    से, लिए  राम  भी जीत।।


               एक में सब

विरह मिलन सुख दुख सभी,जीवन के बहु भाव।

नहीं   नियंत्रण   व्यक्ति   का, मरहम भी वे   घाव।।


शुभमस्तु !

25.10.2025●10.45प०मा०

                 ●●●

बिचला हिंदुस्तान [ नवगीत ]

 643/2025


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक ओर बी

एक ओर पी

बिचला हिंदुस्तान।


घटता बढ़ता

बी पी रहता

कब पड़ जाए दौरा

लिए कटोरा

घूम रहे वे

सुलभ न जिनको कौरा

चूहों की

हाथी से टक्कर

मसक संग हनुमान।


रहे बिलबिला

बी पी वाले

रहे निकल कर भाग

शायद 

कौर मिले रोटी का

किस्मत जाए जाग

आदत में

दंशन ही जिसके

छोड़ें  तीर -कमान।


पूँछ दबी 

दोनों टाँगों में

किंतु तरेरे आँख

उड़ना चाह रहा

अंबर में 

यद्यपि दुर्बल पाँख 

सी सी की

चटनी की चाहत

गले अटकते  प्रान।


शुभमस्तु !


25.10.2025●2.15 प०मा०

                   ●●●

आकर यहीं का हो गया [ नवगीत ]

 642/2025


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 आ गया

सो आ गया

आकर यहीं का हो गया।


आया

नहीं था

लौट जाने के लिए

ढूंढता 

निज आशियाना

बहुत पाने के लिए

मुफ्त खाया

चैन पाया

खाकर यहीं पर सो गया।


वेश बदला

भीख माँगी

गेरुआ में घुस गया

लूट चोरी

कर डकैती

देश सारा चुस गया

आधार 

राशन कार्ड लेकर

पाकर सभी कुछ, खो गया।


पूँछ जो

पहले दबी थी

अब तनी है

जो दशा

पहले बुरी थी

अब बनी है

देखते रहना

हे स्वागती

आकर नहीं वह, लो गया !


शुभमस्तु !


25.10.2025●11.00आ०मा०

                 ●●●

धर्मशाला बन गया है देश [ नवगीत ]

 641/2025


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


धर्मशाला

बन गया है

धर्म का ये देश।


बिना पूछे

जाति को

या धर्म को

आगमन का 

लक्ष्य क्या

संदर्भ को

बाँह फैलाए

खड़ा है

बेशर्म-सा ये देश।


'अतिथि 

देवो भव'

यही सत मंत्र है

इसलिए 

हर आगमन

स्व  तंत्र है

मुफ़्त

वितरण  को खड़ा

सद्धर्म का ये देश।


आगमन 

जिसका हुआ 

लौटा नहीं

गाड़ता है

ध्वज हरा

वह सब कहीं

सबको

समाहित कर रहा

अति नर्म -सा ये देश।


शुभमस्तु !


25.10.2025 ●10.15 आ०मा०

                   ●●●

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

हर्षित [कुंडलिया]

 640/2025


                    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करना     है   हर्षित  उन्हें, मात-पिता गुरु श्रेष्ठ।

गुण  वय में   जो हैं   बड़े, किसी अर्थ में ज्येष्ठ।।

किसी    अर्थ  में   ज्येष्ठ,आचरण  करने ऐसे।

मिले न   किंचित  कष्ट,खिले फुलबगिया जैसे।।

'शुभम्' न हो अपमान, कष्ट तन-मन के हरना।।

देना    हर्ष   अपार,  सदा   सुविचारित करना।।


                         -2-

वाणी     ऐसी    बोलिए,  वचनों    में   रस   घोल।

हर्षित   हो  जनगण सभी, भार  शब्द का  तोल।।

भार   शब्द   का  तोल, नहीं  कुछ ऐसा कहना।

लगे  स्वयं    ही   भार,  पड़े फिर उलटा सहना।।

'शुभम्'  खिलें  उर-फूल, अमियवत हो कल्याणी।

रहे   सदा     अनुकूल,   वही    बोलें   हम वाणी।।


                         -3-

करते   संतति-कर्म  ही, हर्षित  मन को मित्र।

सबसे  उत्तम  है  यहाँ, उनका   चारु चरित्र।।

उनका   चारु चरित्र,   जगत  में नाम कमाए।

चर्चा हो   जिस  ओर , इत्र  महका ही जाए।।

'शुभम्'   करें वे काम,कुयश जो किंचित हरते।

जीवन   में    विश्राम, वही  हर्षित   हो करते।।


                         -4-

चाहत   सबकी   एक  ही, अपनों  से हो प्यार।

हर्षित  वे  मन   में  सभी, भले जगत से  रार।।

भले    जगत   से  रार,  बैर  जन डटकर ठाने।

उसे   न   भाता    प्यार,  नहीं  कहने  से माने।।

'शुभम्'    केंद्र   के बिंदु, निजी  संपति दे राहत।

करे   अन्य  से   बैर, नहीं  शुभता  की चाहत।।


                         -5-

आई     है   ऋतु शीत  की, मन  हर्षित  है  शांत।

विदा    हुई    बरसात   से,   नमी   सघन उद्भ्रांत।।

नमी      सघन   उद्भ्रांत,  जीव जन  चेतन   सारे।

मन    में   हैं   उत्फुल्ल,  नदी   के  विमल किनारे ।।

'शुभम्'   नहीं   शैवाल,  नहीं   उलझी - सी  काई।

पड़े     गुलाबी     ठंड,   शीत   ऋतु  हर्षक   आई।।


शुभमस्तु !


24.10.2025●2.15 प०मा०

                    ●●●

सनातनी [ मुक्तक ]

 639/ 2025


            


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कहते   खुद      को   सनातनी   हैं,

इनमें     ही    तो     तनातनी     है,

एकसूत्रता     के        बस      नारे,

आपस    में     ही    रार     ठनी है।


जातिवाद      में     खंडित      सारे,

अगड़े      पिछड़े      सब      बेचारे,

सनातनी     का        ओढ़े     चोगा,

ऊँच-नीच         के      खांडे   धारे।


आपस      में    अति   भेदभाव   है,

बढ़े  न     कोई      यही       चाव है,

सनातनी  में      बने      न    संगति,

बना     हृदय   में  बड़ा    घाव    है।


सनातनी   कब  खुद     को   झाँकें,

अन्य     धर्म     के     भीतर   ताकें,

ईश - भेद     का       बजता   डंका,

ऊँची       करते      अपनी     नाकें।


सनातनी       मतलब       के     पूरे,

पड़े        स्वार्थ      वे     पूजें    घूरे,

काग     श्वान     में   पितर  वास  है,

खाते       पूरी           खीर    जमूरे।


नहीं   एकता       भाव    वहाँ   पर,

सनातनी     का    वास  जहाँ   पर,

आपस      में     ही    लड़ते  रहना,

धर्मों     का   नित  चलता  चक्कर।


गीत      सनातन     के   बस  गाएँ,

ध्वज  अपना       ऊपर    फहराएं,

सनातनी     की     भौंह    तनी   हैं,

करते  आज न      कल    पछताएं।


शुभमस्तु !


24.10.2025●11.45 आ०मा०

                       ●●●

एल ओ सी बनाम लाइन ऑफ चिल्ड्रेन [ अतुकांतिका]

 638/2025

       

    


शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एल ओ सी अर्थात

लाइन ऑफ चिल्ड्रेन

बच्चों ने बनाई

कबड्डी खेलने के लिए,

एक पाला मात्र 

खेलने की पूरी छूट।


पाले के इधर खेलो

और खेलते -खेलते

यहीं बस जाओ

आशियाना बनाओ

झुग्गी को सजाओ

बनवाकर राशनकार्ड

मुफ्त की खाओ ।


ये देश नहीं 

एक धर्मशाला है,

जिसमें किसी के आने पर

कोई रोक नहीं,

आओ और बस भी जाओ

फिर यहीं  के कहलाओ।


यह 'आजाद' धर्मशाला है

जिसको चाहिए 

उसे मिल जाता

 गरम मसाला भी,

पूरी आजादी है

कोई दीवार नहीं

दर भी नहीं

और डर भी नहीं

बदलो वेश और

आजाद घूमो कहीं,

मौका मिले तो

'रसनीति' के

 लबादे में घुस जाओ

और मौज मस्ती करो

 खाओ ,

उड़ाओ चाहे बस्तियां

या आदमियों के चिथड़े

यहाँ के 'खिलाड़ी'

बड़े ही उदार हैं,

समाहित कर ही लेंगे,

ऐसा सुख भला और कहाँ,

लूटो खाओ और

बस जाओ यहाँ।


शुभमस्तु !


24.10.2025 ●6.15 आ०मा०

                   ●●●

छोड़ आदमियत आज आदमी [ नवगीत ]

 637/2025


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 छोड़ आदमियत

आज आदमी

करता फिरे शिकार।


मिले कहीं जो

एक आदमी

सोचे मिला शिकार

कैसे उसका

भोग लगाए

मन में जगे विकार

मरे हृदय के भाव

मनुज के 

सूखे सड़े विचार।


कर लेना 

विश्वास श्वान का

मनुज नहीं इस योग्य

बैठा है 

शैतान बुद्धि में

मनुज मात्र उपभोग्य

जीत गया

हिंसक पशुओं से

गया मनुज से हार।


प्रेम दया 

ग्रंथों की बातें

फैला हिंसाचार

नहीं चाहिए

उसे एकता

खंडन खोले द्वार

मानव ही

मानव को ग्रसता

करके अत्याचार।


शुभमस्तु !


23.10.2025●1.30 प०मा०

                 ●●●

रोकने को रास्ता [ नवगीत ]

 636/2025


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रोकने को रास्ता

कितने खड़े हैं !


बिके बकरी

वे बताएँ श्वान उसको

लोभ का आदेश

देखें  जीभ-रस को

पारखी 

हर राह को रोके अड़े हैं।


चार ठग चंडाल का

खेला यहाँ है

टंगड़ी अपनी अड़ाने

का जहाँ है

चित्त को पट वे करें

ध्वज -से गड़े हैं।


सुन सभी की बात

पर करना वही है

जो कहे निज ज्ञान

वह होता सही है

बहुत मुख हैं

तर्क के  अंधड़े हैं।


शुभमस्तु !


23.10.2025 ●12.15प०मा०

                ●●●

नक्कारे नकारों के बजे [ नवगीत]

 635/2025

     

        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नक्कारे

नकारों के बजे

कैसे सुनें हम।


क्यों

सकारों से नहीं

सरोकार कोई

खोजते

जन अटपटा

धूमिल रसोई

स्वप्न अच्छे के

कहो 

कैसे बुनें हम।


जानकर कोई

 बुरा

करता नहीं है

दृष्टि में हो 

दोष 

क्या कुछ कहीं है

श्रेष्ठता ही

श्रेष्ठता 

कैसे चुनें हम।


कोष की रूई

चुनें

बाती बनाएँ

शब्द को

साकार कर

आभा जगाएँ

बहु नकारों

के लिए

क्या सिर धुनें हम ?


शुभमस्तु !


23.10.2025●10.45 आ०मा०

               ●●●

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

दियों का काम क्या है! [ नवगीत ]

 634/2025


  


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उजालों में

अहिंसा के 

दियों का काम क्या है।


हर  शाख  पर

उल्लू 

बसेरा कर रहे हैं

गधे अब 

दाख पर

गुजारा कर रहे हैं

कौन लूटे

या खसोटे 

जानते अंजाम क्या है !


सड़क पर

हो लूट

दर्शक ही मिलेंगे

विडियोबाजी करें

मरदूद

हर्षक ही दिखेंगे

रौशनी में

प्राण रक्षक को

हुआ आरामगाह है।


खोखले 

आदर्श के

दिन अब नहीं हैं

अब हकीकत 

और है

सब कुछ सही है

धर्मशाला

देश है

खामा खाम क्या है !


शुभमस्तु !


21.10.2025●12.15 प०मा०

                 ●●●

देश धर्म की शाला [ नवगीत ]

633/2025


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आओ खुली हुई

स्वागत को

देश धर्म की शाला।


भाई को चारा ही समझो

पंखहीन बेचारा समझो

जब चाहो तब काटो

सरकारी जमीन हथियाओ

राशन गैस मुफ़्त में पाओ

नित्य  मलाई  चाटो

कुछ भी करना  रोक नहीं है

किंचित कण भर टोक नहीं है

फैला डालो जाला।


देव अतिथि है सभी मानते

गले लगाते   बिना ज्ञान के

आओ  सिर पर बैठो

जिस थाली में खाना खाओ

छेद करो पग से ठुकराओ

और  बाद  में   ऐंठो

दुनिया   में  जो  कहीं नहीं है

सुविधा साधन सभी  यहीं है

फैला      गड़बड़झाला ।


जो भी   आया  उसने चूसा

वैभव जन को डटकर मूसा

हम उदारतावादी

नंगे   रहो   उन्हें  पहनाओ

सत्य अहिंसा के गुण गाओ

पहन देह पर खादी

छँटे हुए   हैं   मूढ़   यहीं  पर

मिट जाएँ पर हिले नहीं कर

प्रतिबंधों पर ताला।


शुभमस्तु !


21.10.2025● 10.30 आ०मा०

                     ●●●

[12:17 pm, 21/10/2025] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

दीप अकेला [ गीत ]

 632/2025

       

              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दीप अकेला

करे उजेला

अँधियारे को चीर।


माटी का तन 

सोने-सा मन

भरे नेह का तेल

श्वेत  वर्तिका

बनी नर्तिका

सिखलाती है मेल

मुँह में आग 

सुलगती जलती

जतलाती धर धीर।


 जिसको पाना

 उसको खोना 

कुछ तो होता त्याग

पुष्प खिला जब

महक उठा तब

जाग्रत होता भाग

जब प्रकाश हो

बँधी आश हो

महके  तेज उशीर।


आज दिवाली

खूब मना ली

आतिशबाजी धूम

सभी मग्न हैं

लगी लग्न है

नर्तित बालक घूम

भूखे पेट न कोई सोए

दूध बिना शैशव क्यों रोए

लिखी हुई तकदीर।


शुभमस्तु !


20.10.2025● 11.00 प०मा०

                   ●●●

सो रहा है देश [ नवगीत ]

 631/2025

           

            

© शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सो   रहा है  देश

करो मत क्लेश

इसे मत जगाना।


कोई  भी  आ  जाए

आकर वह बस जाए

मनाही नहीं है

भले देश लूटे

मारे और कूटे

सुनवाई नहीं है

इन्हें अतिथि मानो

देवता ही जानो

इन्हें मत भगाना।


संस्कृति ये हमारी

प्राणों से भी प्यारी

सहते हैं  चांटे

इस गाल पर

या उस गाल पर 

पड़ें जो घुमाके

बदले में उनको

छूना न पल को

नहीं  है डराना।


हम सब उदारवादी

दर्द सहने के आदी 

मिटने को राजी

बाहरी एक पिल्ला

भले   क्रूर  ढिल्ला

सौ फीसद पाजी

दबा   लेना  खड़ी दुम

करना नहीं  कुन कुम

फिर मत उठाना।


शुभमस्तु !


20.10.2025●5.15 प०मा०

                  ●●●

कोई दीवार नहीं! [ नवगीत ]

 630/2025


         


© शब्दकार

डॉ० भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कोई दीवार नहीं

दर भी नहीं कोई

घुसपैठियों को कोई डर ही नहीं।


पूरब  से आओ

या पश्चिम से ठुसो

ये देश नहीं,  धर्मशाला है

खाने को मिलेगा

मुफ़्त का राशन

कहीं नहीं यहाँ एक ताला है

नीबू की तरह निचोड़ दो

जहाँ चाहो इसे मोड़ दो

किसी को कोई उजर ही नहीं।


लूटो - खसोटो देश को

बदले रहो निज वेश को

संत बनो या बनो डाकू

बहका कर युवा लड़कियां

लोगों को  लगाओ झिड़कियाँ

खुलेआम चलाओ चाकू

सोया हुआ है देश

पूजता हुआ छद्म वेश

जगा मत देना कोई असर ही नहीं।


यहाँ  कोई  अगड़ा है

उधर कोई पिछड़ा है

सब जातिवादी  मूढ़ हैं

सनातनी एक भी नहीं

तनातनी सब जगह रही

कूढ़ गर्दभारूढ़ हैं

पतन  का   ये  दौर   है

जन-जन के मन चोर है

सुनाई कैसे देगा इन्हें बजर भी नहीं।


शुभमस्तु !


20.10.2025● 1.45प०मा०

                 ●●●

कोई भी आकर बस जाए [ नवगीत ]

 629/2025


       


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


यहाँ न कोई

 रोक-टोक है

कोई भी आकर बस जाए।


शाला है यह

मात्र धर्म की

कोई भी प्रतिबंध नहीं है

होता है जो

भारत भू पर

दुनिया में वह नहीं कहीं है

आए 

खाली हाथ मुसाफ़िर

तरह-तरह के सद रस पाए।


बनवाया

आधार कार्ड भी

झुग्गी बना बपौती पाई

मिले मुफ्त का

राशन पानी

और जुगाड़ी यहीं लुगाई

कोई बना 

साधु संन्यासी

कोई डाके डाल सताए।


घुलमिल गया

यहाँ जनता में

कहता मैं तो भारतवासी

तिलक लगाया

रँगे गेरुआ

भीख माँगता बना उदासी

प्रश्न करो तो

तुम्हें फँसा दे

क्या सरकारी नियम बनाए?


शुभमस्तु !


20.10.2025●1.00प०मा०

                ●●●

ज्योति पर्व यह शुभद दिवाली [ गीतिका ]

 628/2025



 


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


फूट    रही      प्राची     में    लाली।

रवि  की    महिमा  बड़ी   निराली।।


आया   पाँच  दिवस    का  उत्सव,

ज्योति पर्व  यह   शुभद   दिवाली।


लाई      रात         अमावस्या   की,

भरी  सितारों     से      नभ-थाली।


नहीं       बुभुक्षित      सोए    कोई,

न हों   किसी     की    रातें  काली।


कलकल छलछल   बहती   यमुना,

ब्रज     में     रास    रचें  वनमाली।


गोप-गोपियाँ        निकले    घर  से,

चहक    उठी    खग दल से डाली।


'शुभम्'  मिटाएँ  मन  के तम  भ्रम,

बिना  ज्योति  घर  रहे    न खाली।


शुभमस्तु !


20.10.2025●5.00आरोहणम मार्तण्डस्य।

                ●●●

आया पाँच दिवस का उत्सव [ सजल ]

 627/2025




समांत        : आली

पदांत         : अपदांत

मात्राभार    :  16.

मात्रा पतन  :शून्य


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


फूट    रही      प्राची     में    लाली।

रवि  की    महिमा  बड़ी   निराली।।


आया   पाँच  दिवस    का  उत्सव।

ज्योति पर्व  यह   शुभद   दिवाली।।


लाई      रात         अमावस्या   की।

भरी  सितारों     से      नभ-थाली।।


नहीं       बुभुक्षित      सोए    कोई।

न हों   किसी     की    रातें  काली।।


कलकल छलछल     बहती  यमुना।

ब्रज     में     रास    रचें   वनमाली।।


गोप-गोपियाँ        निकले    घर  से।

चहक    उठी    खग दल से डाली।।


'शुभम्'  मिटाएँ  मन  के तम  भ्रम।

बिना  ज्योति  घर  रहे    न खाली।।


शुभमस्तु !


20.10.2025●5.00आरोहणम मार्तण्डस्य।

                ●●●

आह फैशन! वाह फैशन!! [ नवगीत ]

 626/2025


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चीथड़े 

तन पर सजे हैं

आह फैशन ! वाह फैशन !!


देह 

ढँकने के लिए ये

वस्त्र आभूषण नहीं हैं

नग्नता

ही लक्ष्य इनका

अंग -  दर्शन ही यहीं है

ठिठुरते 

तन के मज़े हैं

आह फैशन ! वाह फैशन!!


बेच खाई

हया लज्जा

नारियों ने आज अपनी

मान-मर्यादा

की न चिड़िया 

अब उड़ेगी उच्च इतनी

पहने नहीं

तन पर   गँजे हैं

आह फैशन ! वाह फैशन!!


जो दिखाई

दे न सबको

देह क्या तंबू तना है

कोण गोलाई

दिखें सब

वक्त की आराधना है

ढोर भी

इनसे भले हैं

आह फैशन ! वाह फैशन !!


शुभमस्तु !


19.10.2025●9.30 आ०मा०

                    ●●●

सच-सच कहते शब्द शब्दशः [ नवगीत ]

 625/2025



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सच- सच कहते

शब्द शब्दशः 

झुठलाएँ क्यों तथ्य !


दोनों आँखें

दिल का दर्पण

खुशियाँ या कि विषाद

अनबोले

सच कह देती हैं

किंचित करें न नाद

दिल में हो

जब पीर मर्म की

उसे न भाए पथ्य।


शब्दों में 

बहता है जीवन

लगते हैं जड़ जीव

कविता में

भर देते जीवन

सुदृढ़ जिनकी नींव

कह देते

सब खोल-खोल कर

छिपा हुआ जो कथ्य।


सहज नहीं है

भेद छिपाना 

सृजन नहीं है व्यर्थ

ईश्वर की 

प्रतिकृति है इनमें

समझ सकें जो अर्थ

सदा चाहते

शब्दकोष के

शब्द सबलतम रथ्य।


शुभमस्तु !


16.10.2025●12.30 प०मा०

                    ●●●

देह के भीतर कब्रिस्तान [ अतुकांतिका ]

 624/2025

     

      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जिनके उदर

श्मशान शवों के

वीरान हैं वे

आरोग्य से।


अपनी एक अँगुली

काट कर देख

दर्द तो होता होगा

अपनी सोच को

विस्तार देकर देख

उतार दे

ये बनावटी चोगा।


मार कर खाना

अथवा मरा हुआ खाना

ये दोष किस पर जाना ?

माँस से माँस का स्वाद

वाह रे !आदमी की औलाद?


कर्म का बीज

कभी न कभी उगता है

आज जो तू

स्वाद ले लेकर चुगता है

वही तो जीवन में

कभी न कभी

फलता है।


आदमी की देह में

हिंस्र ढोर की संतान

देह के भीतर कब्रिस्तान

वाह रे! धर्म धुरंधर इंसान ?

तू आदमी है या शैतान?


शुभमस्तु !


16.10.2025●6.45आ०मा०

                   ●●●

आरोग्य [ सोरठा ]

 623/2025


                   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देते  तन - आरोग्य, धनवन्तरि भगवान ही।

जो प्रभु  के  संभोग्य, आओ सब पूजें उन्हें।।

मिलें सकल सुख धाम,तन में यदि आरोग्य है।

सीताराम   ललाम,  वह   प्रयाग कैलाश भी।।


जहाँ   नहीं आरोग्य, निर्धन हैं मानव सभी।

तन-मन के उपभोग्य,सुलभ नहीं साधन उसे।।

होता सहज सुवास,जिस घर में आरोग्य का।

किसे न आए  रास, वहीं  स्वर्ग  की भूमि है।।


मिलें   सकल  भंडार,अमृत पी आरोग्य का।

रहना   सहज  उदार, व्यसनों को दे त्याग तू।।

धन   कोई   भी  मित्र,  बड़ा नहीं आरोग्य  से।

सबसे   श्रेष्ठ   चरित्र,   सोना - चाँदी     धूल है।।


उत्तम  एक   उपाय, सात्विकता आरोग्य का।

विरुज  न रहती  काय,  करता  माँसाहार जो।।

स्वर्ण रजत सब व्यर्थ,धन तन का आरोग्य है।

नहीं   गात  को अर्थ,बिना स्वस्थ मन के मिले।।


उसे   कहाँ  आरोग्य,  प्रकृति  से जो दूर है।

जो   न मनुज   के योग्य,पराधीन रहना उसे।।

ए.सी. से  रह  दूर,  चलो  पेड़   की  छाँव में।

सुखद शांति भरपूर,वहीं धाम आरोग्य का।।


रखें   न मित्रो ध्यान,एक दिवस आरोग्य  का।

जीवन    बने  महान,  जागरूक   रहना सदा।


शुभमस्तु !


16.10.2025●5.15 आ०मा०

                    ●●●

ईंटों की दीवार चार थीं ! [ नवगीत ]

 622/2025


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ईंटों की

दीवार चार थीं

तुमने गेह बनाया।


मैं तो शव था

शक्ति तुम्हारी

प्राण फूँकती अनुदिन

रमा तुम्हीं

शारदा तुम्हीं हो

अन्नपूर्णा  प्रति छिन

चूल्हा चौका

यंत्र तुम्हारे

जिनसे नेह बनाया।


एक-एक 

आँसू में बसते

अणुबम और मिसाइल

किले ध्वस्त होते

भू हिलती

कौन नहीं  है  काइल

एक सूक्ष्म

 कण से हे भामिनि

तुमने  देह  बनाया।


संभव नहीं

विरोध तुहारा

जो चाहो करवाओ

बैठ शेर की

पीठ चंचले 

उसको नाच नचाओ

रहा नहीं

अस्तित्व असुर का

क्षण में खेह बनाया।


शुभमस्तु !


15.10.2025● 1.00प०मा०

                ●●●

करवा चौथ मनाती पत्नी [ नवगीत ]

 621/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करवा चौथ

मनाती पत्नी

पति हित माँग दुआ।


निर्जल व्रत

निरन्न भी रहती

चंद्रोदय को देख

पति के हाथों

पिए नीर वह

शेष न चिंता रेख

उम्र बढ़े

उसके प्रियतम की

करे न स्वांग  जुआ।


सत्यवान की

सावित्री वह

जीतेगी यमराज

करे साधना

तन मन धन से

चमकायेगी ताज

दिखला देगी

इस दुनिया को

अब तक नहीं हुआ।


एक चाँद है

नील गगन में

एक आँख के पास

दुआ करे

नभ के चंदा से

उसे पूर्ण विश्वास

पूर्ण समर्पण

डिगे न किंचित

कण भर नहीं धुँआ।


शुभमस्तु !


15.10.2025● 12.30 प०मा०

                    ●●●

बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

खुजलाहट कुर्सी की ऐसी [ नवगीत ]

 620/2025


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खुजलाहट 

कुर्सी की ऐसी

चलते -चलते थकें न पाँव।


अंग -अंग में

रौरापन है

कैसे कहाँ खुजाएँ

फड़क रही हैं

तनकर ऊपर

मेरी युगल भुजाएँ

बस्ती -बस्ती

गाँव  -नगर में

लगा रहे हैं कितने दाँव।


गोली 

आश्वासन की मीठी

रहे बड़ी हितकारी

ई वी एम -

बटन जब बोले

पीं-पीं की स्वीकारी

जनता ही तो

पीपल शीशम

बरगद की घन  छाँव।


एकमात्र हम 

देशभक्त हैं

चिंता हमें सताती

हम ही तो 

उजियारा लाते

जले देश की बाती

इसीलिए तो

चौपालों पर

होती है झक - झाँव।


शुभमस्तु !


14.10.2025●10.15 आ०मा०

                  ●●●

बदली-बदली हवा चली है [ नवगीत ]

 619/2025




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बदली-बदली

हवा चली है

उड़ते विकट बगूले हैं।


पापा जी की

परियाँ उड़तीं

गंधरवी नर खूब उड़ें

रील अधिक

रीयल है किंचित

मोड़ें तो भी नहीं मुड़ें

झिंझरीदार

झूलते तन पर

मैले छिद्र झंगूले हैं।


नित्य बहाने

मात-पिता से

घर में काला बाजारी

सम्मुख उनके

भोले भाले

दिखलाते निज लाचारी

नहीं फली भी

एक तोड़ते 

संतति हुक्म-उदूले हैं।


शिष्टाचार

भाड़ में झोंके

चरण नहीं छूते जाँघें

ऐश और

आराम चाहिए

नीति नियम खूँटी टाँगें

लगते नहीं

मनुज धरती के

माटी के सब चूले हैं।


शुभमस्तु !


13.10.2025● 4.15 प०मा०

                   ●●●

शैतानों से होड़ लगी है [ नवगीत ]

 618/2025




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शैतानों से

होड़ लगी है

तुम आगे पीछे शैतान।


जलदी-जलदी

सब निपटा लो

निकले   नहीं  वक्त की रेल

समय पूर्व

झटपट कर डालो

खेल अनैतिक कितने खेल

सत को रखा

ताक के ऊपर

बना हुआ मानव हैवान।


फिल्मों के

अभिनीत नचनिये

अब आदर्श तुम्हारे सारे

राम कृष्ण को

नहीं जानते

युवती-युवा आज बजमारे

रामायण या

विदुरनीति  के

पाठ हुए थोथे बेजान।


ब्याह रचा

नववधू विराजी

निजता की रखवाली में

सास-ससुर

वृद्धाश्रम भेजे

लगन लगाई साली में

सोते निधड़क

युगल नवोदित

चिकनी रेशम चादर तान।


शुभमस्तु !


13.101.2025●11.45 आ०मा०

                  ●●●

अब क्या कुछ भी बाकी है! [ नवगीत ]

 617/2025



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पहले ही

सब जान लिया है

अब क्या कुछ भी बाकी है!


जिसे देखना

वर्ष अनंतर

पहले ही वह देख लिया

अंदर बाहर

खूब टटोला

अंग -अंग को पेख दिया

जिज्ञासाएँ

मरी हुई हैं

दैनन्दिन की चाकी है।


गाड़ी में

पीछे का डिब्बा

जब आगे जुड़ जाता है

इंजिन रहे

घिसटता पीछे

हाँफ-हाँफ घबराता है

शक्ति निचुड़ती

पहले जिसकी

ढीला पड़ता साकी है।


कहते हो 

जिसको लकीर तुम

वह पत्थर से बनी हुई

जिसे खोज

नवयुग की कहते 

उनसे ही अब ठनी हुई

पहला कदम

रखा जिस पथ में

चरण चंद्रिका थाकी है।


शुभमस्तु !


13.10.2025●11.15 आ०मा०

                 ●●●

संस्कार सुस्ताए हैं! [ नवगीत ]

 616/2025


    


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 ईविंटों के

 इन्वेंशन में

संस्कार सुस्ताए हैं।


संस्कृतियों की

होली जलती

इविंटों की दीवाली

पहले रात 

सुहाग मनाएँ

झाड़ कुंज में दे ताली

शादी का क्या

करो कभी भी

बिलकुल नहीं लजाए हैं।


कर लो मौज

मजा सब पहले

रखें ताक पर मर्यादा

नर -नारी

अब बचे नहीं हैं

बचे हुए हैं नर -मादा

क्या होगा

सुहाग शैया पर

पहले सब कर आए हैं।


आगे-आगे

युवा-युवतियाँ

पीछे मात-पिता मजबूर

हम जो करें

दखल मत देना

रहना सौ-सौ कोसों दूर

फेरे पड़े

लौट घर आए

बड़े बुरे पछताए हैं।


शुभमस्तु !


13.10.2025●10.45आ०मा०

                   ●●●

दर्शन [ चौपाई ]

 615/2025


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दर्शन  लाभ     ईश    का   करता।

मानव  वही  दोष     निज    हरता।।

देवालय  में        प्रतिदिन      जाते।

अपने  -   अपने      पाप    नसाते।।


नेताओं     का        दर्शन    पाना।

दुर्लभ    हुआ     कृपा    बरसाना।।

द्वारपाल      द्वारों      पर     ठाड़े।

नेता  -   दर्शन    में     वे     आड़े।।


मात  - पिता      के  दर्शन   पाना।

भाग्यवान  को     मिले     सुहाना।।

भोर  हुआ  सुत दर्शन   कर  ले।

कृपा करों  का आशिष    धर   ले।।


जीव      जगत    संसार     बनाया।

ईश  ब्रह्म  की     अद्भुत      माया।।

दर्शन  शास्त्र      रहस्य     बताए।

अजब    पहेली    को    सुलझाए।।


बाल वृद्ध      किशोर     नर- नारी।

करे   तीर्थ   जनता    सब    भारी।।

नहा      रहे     हैं  बहु    जन  गंगा।

दर्शन  लाभ     करें      मन चंगा।।


दर्शन     नहीं        देखना   कोरा।

भाव     भरा    है   मन   का भोरा।।

दर्शन से जन     धन्य     हुआ  है।

बंद अघों  का  अतल   कुँआ    है।।


दर्शन की    महिमा    अति  भारी।

धर्म-  धर्म के      सब    नर-  नारी।।

बारह      मास     करें        यात्राएँ।

किंचित  घटें    न     जन   मात्राएँ।।


शुभमस्तु !


13.10.2025● 2.15 आ०मा०

                   ●●●

विपदा के साँचे में ढाले [ गीतिका ]

 614/2025


           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


विपदा   के     साँचे      में      ढाले।

मानव    जग    में   बड़े     निराले।।


निशिदिन  तेज     प्रभंजन   चलते,

फिर  भी    वे     रहते     मतवाले।


नेता   अलग    प्रजाति   मनुज की,

कब  बदलें      वे     अपने   पाले।


आम  जनों    का     शोषण  होता,

जो      रहते       बन   भोले भाले।


लगता   सत्य  सभी    को   कड़ुवा,

सत्यवादिता    पर      हैं       ताले।


कहाँ      नहीं      परिवारवाद     है,

बेटा        बेटी       पत्नी      साले।


'शुभम्'    तंत्र     विकृत    है  सारा,

तमसावृत    घर        काले -काले।


शुभमस्तु !


13.10.2025●1.45 आ०मा०

                     ●●●

तंत्र विकृत है सारा [ सजल ]

 613/2025



समांत        : आले

पदांत         : अपदांत

मात्राभार     : 16.

मात्रा पतन   : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


विपदा   के     साँचे      में      ढाले।

मानव    जग    में   बड़े     निराले।।


निशिदिन  तेज     प्रभंजन   चलते।

फिर  भी    वे     रहते     मतवाले।।


नेता   अलग    प्रजाति   मनुज की।

कब  बदलें      वे     अपने   पाले।।


आम  जनों    का     शोषण  होता।

जो      रहते       बन   भोले भाले।।


लगता   सत्य  सभी    को   कड़ुवा।

सत्यवादिता    पर      हैं       ताले।।


कहाँ      नहीं      परिवारवाद     है।

बेटा        बेटी       पत्नी      साले।।


'शुभम्'    तंत्र     विकृत    है  सारा।

तमसावृत    घर        काले -काले।।


शुभमस्तु !


13.10.2025●1.45 आ०मा०

                     ●●●

परिवार [ दोहा ]

 612/2025


        

   [माता,पिता,भाई ,बहिन ,बच्चे ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


               सब में एक

माता   स्वर्ग   समान   है, ताने सुखद वितान।

निज सुख के हर त्याग से,करे सुखों का दान।।

संतति   होती   है कभी,उऋण  न  माँ से  मीत।

माता का  जिसको मिले, नेह  वही जग  जीत।।


सुहृद   पिता - सा   विश्व में, नहीं मिलेगा एक।

रहता   भले  अभाव में, संतति  को नित नेक।।

जननी धरणी  पुत्र  की,पिता विशद आकाश।

वही   मात्र   विश्वास है, वही  एक  शुभ आश।।


कलयुग    के  भाई  नहीं, लखन भरत-से नेक।

देखें    दृष्टि   पसार  के, मिले  न  जग  में एक।।

भले   रक्त    सम्बंध    हों,  नहीं    बंधुता भाव।

भाई   हिस्सेदार   है,  शेष   न  प्रियता - नाव।।


दो  कुल को ज्योतित करे,यही बहिन का  रूप।

नारी   वह    गृहलक्ष्मी,  जननी अटल   अनूप।।

बहिन   रमा  वह   शारदा, बहु नारी  आयाम।

शक्ति  गेह - निर्माण   की, देख सुबह से शाम।।


जिस  घर  में  क्रीड़ा करें, मिल बच्चे   दो-चार।

स्वर्ग   वही   शुभ  गेह  है,शुचिता का व्यवहार।।

चाहत   बच्चे   की  करें,  सभी    दंपती   नित्य।

वही चाँद शुभ गेह  का, वही   सुयश आदित्य।।


                 एक में सब

बच्चे  भाई  बहिन से, माता को   सुखवास।

गदगद पिता प्रसन्न   हैं,  घर  में  भरा उजास।।


शुभमस्तु !


12.10.2025●10.30आ०मा०

                     ●●●

उपकार [ कुंडलिया ]

 611/2025


           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करता  पर-उपकार    जो,रहता  नहीं मलीन।

जाग्रत  हो  सौभाग्य  का,सूरज  सदा नवीन।।

सूरज  सदा  नवीन,  खिलें कलियों से पाटल।

भ्रमर    करें   गुंजार,  बरसते  नभ   से बादल।।

'शुभम्' हरे  पर  पीर,  कष्ट  जनगण के हरता।

मानव   धर   के  धीर,मनुजता धारण करता।।


                         -2-

अपने    ही  उपकार    में,  लगा   हुआ संसार।

नहीं   देखता   और    की,  पीर न   करे दुलार।।

पीर    न    करे    दुलार,  दर्द   औरों   को देता।

उर   भी    नहीं   उदार, बना फिरता जग जेता।।

'शुभम्'  नाट्य  उपकार, भाव  के दिखते सपने।

सब    मिथ्या   आचार,  भले लगते सब अपने।।


                         -3-

नाटक     में    उपकार    के,   नेतागण तल्लीन।

मधुर-मधुर    हैं   बोलियाँ,  मन  हैं  किंतु मलीन।।

मन   हैं   किंतु   मलीन,  खबर  अपनी छपवाएं।

फोटो      हँसें    नवीन,  नहीं  जनहित में जाएँ।।

'शुभम्'    देश  का  हाल, बंद उन्नति का फाटक।

उपकारों      का    झूठ,  चलाया  जाता नाटक।।


                            -4-

मानव    तन   उपकार  का, एक सहज  पर्याय।

किंतु नहीं  करते सभी, इसका     एक    उपाय।।

इसका     एक   उपाय,   नाम  की कोरी चाहत।

भले   न  उर   में   भाव, नहीं   देते कण राहत।।

'शुभम्'    अधिकतम   लोग, बने कर्मों से दानव।

उपकारों      से    दूर,  देह    से   केवल मानव।।


                         -5-

गाते   पर - उपकार   के,  कुछ  नर केवल गान।

करें     नहीं   उपकार    वे ,   किंतु   चाहते मान।।

किंतु     चाहते     मान,   प्रचारक  बनकर अपने।

जनता   को    दें  त्रास,   दिखाते   दिन में सपने।।

'शुभम्'    मियाँ   मिठबोल, नशे में नित मदमाते।

निज     उपकारी    गीत,   यंत्र   ले  लेकर गाते।।


शुभमस्तु !


09.10.2025●6.45प०मा०

                   ●●●

यही उचित है! [ अतुकांतिका ]

 610/2025


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उनसे मेरी कोई

जान -पहचान नहीं

कोई रंजिश नहीं

कोई बैर नहीं

इसलिए उनसे

मुझे कोई खतरा भी नहीं।


वे बड़े खूँख़्वार हों

शब्दों में 

उगलते हुए ज्वार हों,

मुझे क्या !

मुझे उनसे कोई डर नहीं।


वे बड़े शहंशाह 

अपने घर के,

हम छोटे से प्रवाह

अपने नद के,

उनकी अलग राह

अपनी अलग चाह

उनसे मेरा कोई समर नहीं।


न वे मुझे जानें

न मैं उन्हें पहचानूँ

वे अपने में मस्त

मैं अपने में व्यस्त

उन्हें मेरी कोई खबर नहीं।


यह उचित ही है

कि हम परस्पर 

अनजान  हैं,

वे अलग किस्म के

हम भी अलग जिस्म के

इंसान हैं,

 किसी का किसी से

कोई हस्तक्षेप नहीं है,

सही अर्थों में देखें तो

यही उचित है

सही है,

कहीं कोई गड़बड़ नहीं।


शुभमस्तु !


09.10.2025●3.00प०मा०

                   ●●●

समर्पण [ सोरठा ]

 609/2025


                      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मिलते  हैं  भगवान, सहज समर्पण भाव से।

करें ईश - गुणगान, धन-वैभव दिखला नहीं।।

सहज  समर्पण  भाव,पति -पत्नी संबंध का।

पार   लगाए  नाव, प्रेम   बढ़ाता  नित्य ही।।


करे समर्पण  पूर्ण,शिष्य  करे गुरु -भक्ति तो।

कर दे  क्षण में  चूर्ण, बचे  नहीं अज्ञान- तम।।

संबल सबल सुरम्य,जहाँ समर्पण- शक्ति का।

मिलती   शक्ति   अदम्य,  प्रेम-वृष्टि  होती रहे।।


दृढ़   होता   विश्वास,  सहज समर्पण भाव से।

जीवन   का   अनुप्रास,वहीं   शक्ति-संचार है।।

सुदृढ़  समर्पण  भाव,  बुरा-भला  मैं आपका।

रहे न कोई   घाव,  काटे   तमस -विकार को।।


करें   देश की   भक्ति,प्रेम  समर्पण भाव से।

वही   हमारी   शक्ति,सैनिक   वीर महान हैं।।

नहीं सुफल परिणाम,बिना समर्पण के मिले।

अतुलनीय  अभिराम,वह  अभेद्य दीवार है।।


नहीं   समर्पण   भाव,  जहाँ   सदा प्रतिरोध है।

शुचिता   की   दृढ़   नाव,वहाँ   डूबती है सदा।।

सुघर   समर्पण भाव, संतति जननी- जनक का।

बढ़े    अहर्निश    चाव,  स्वर्ग  बनाए   गेह को।।


नित  खंडित विश्वास,'शुभम्' समर्पण के बिना।

सबको   आए   रास,  रखना वह अक्षुण्ण ही।।


शुभमस्तु !


09.10.2025●8.15आ०मा०

                ●●●

झूठ न बोले दर्पण [ गीत ]

 608/2025


          झूठ न बोले दर्पण

                     [ गीत ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


झूठ न बोले

दर्पण मुख से

सच जतलाए।


खुले केश

मुख पर विषाद है

क्रोध झलकता

उचित नहीं

यह भाव सुंदरी

रूप सुबगता

बिना एक भी

शब्द निकाले

सब बतलाए।


उर में आग

धधकती क्यों है

कहो कामिनी

किससे रूठी हुई

त्रस्त हो

दहो भामिनी

घर को छोड़

विटप तल ठाड़ी

मन उकताए।


अस्त-व्यस्त हैं वस्त्र

बाल भी बिखरे तेरे

बिंदी लाल विशाल

भाल पर भौंहे घेरे

मत बोलो

मुख-दर्पण बोले

उर दुख कह जाए।


शुभमस्तु !


07.10.2025●3.15आ०मा०

                  ●●●

सकल सृष्टि में तमस घना है [ गीतिका ]

 607/202


  


शब्दकार© 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सकल     सृष्टि में   तमस   घना  है।

यहाँ    वहाँ    सर्वत्र      तना     है।।


अपनेपन   में   छल     छद्मों    का,

कालकूट का  पंक       सना     है।


आधारित  धन    पर   सब    रिश्ते,

मानव  का     सम्बंध     मना    है।


हो धनाढ्य    पति    चाहे      नारी,

ऊपर-ऊपर       बनाठना        है।


चरता   चरित  घास      घूरे      पर,

माल   भ्रष्टता     की    जपना    है।


दहला  नारी    नर     पर     भारी,

नहले    नर का   मर     मिटना  है।


'शुभम्'  गर्त     में   मानवता  अब,

नहीं   फोड़ता      भाड़    चना  है।


शुभमस्तु !


06.10.2025●01.45आ०मा०

                     ●●●

नहीं फोड़ता भाड़ चना है [ सजल ]

 606/202


        


समांत        :अना

पदांत         : है

मात्राभार    :16

मात्रा पतन  : शून्य।


शब्दकार© 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सकल     सृष्टि में   तमस   घना  है।

यहाँ    वहाँ    सर्वत्र      तना     है।।


अपनेपन   में   छल     छद्मों    का।

कालकूट का  पंक       सना     है।।


आधारित  धन    पर   सब    रिश्ते।

मानव  का     सम्बंध     मना    है।।


हो धनाढ्य    पति    चाहे      नारी।

ऊपर-ऊपर       बनाठना        है।।


 चरता   चरित  घास      घूरे      पर।

माल   भ्रष्टता     की     जपना    है।।


दहला  नारी    नर     पर     भारी।

नहले    नर का   मर     मिटना  है।।


'शुभम्'  गर्त     में   मानवता  अब।

नहीं   फोड़ता      भाड़    चना  है।।


शुभमस्तु !


06.10.2025●01.45आ०मा०

                     ●●●

जय जय सियाराम [ दोहा ]

 605/2025


        

[अवध,वनवास,चित्रकूट,पंचवटी,जटायु]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                 सब में एक


अवध पुरी में   विष्णु ने,लिया  राम अवतार।

बढ़ा   धरा  पर  दानवी,क्रूर  कर्म  का भार।।

बजी  बधाई अवध में, घर-घर  फैली  बात।

चैत्र  मास  नवमी   सुदी , कौशल्या-सी मात।।


दानव-अत्याचार से ,ऋषि  मुनि थे अति त्रस्त।

हुआ  राम - वनवास तो,सब दानव थे पस्त।।

कैकेयी   की  बुद्धि  को,  दिया   भारती फेर।

वचन  हुए वनवास  के, पल की लगी न देर।।


सियाराम   वनवास   के, बीते  ग्यारह  साल।

चित्रकूट शुभ  धाम में, तप ने किया  कमाल।।

चित्रकूट सिय राम  की,  तप की भूमि पवित्र।

अत्रि आदि  ऋषि संत ने,निर्मित किया चरित्र।।


सिया   राम   वनवास   में, पंचवटी वह ठौर।

रावण   ने  सीता   हरी, बुद्धि  हुई कुछ और।।

सूपनखा    के   कान दो,  और साथ ही नाक।

पंचवटी  में   लखन   ने, काट   दिए बेबाक।।


गरुणवंश   में  गीध  वह,  जन्मा नाम  जटायु।

लड़ा  वही  दशशीश  से, क्षरण  हुई खग आयु।।

दशरथ  का  खग  मित्र भी,और राम का भक्त।

सीता - रक्षण  में  मरा,   वह जटायु अनुरक्त।।


                 एक में सब

चित्रकूट  - वनवास  में,बसे अवध  पति राम।

पंचवटी प्रख्यात   है, खग   जटायु शुभ धाम।।


शुभमस्तु !


05.10.2025●7.45आ०मा०

                    ●●●

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

दसमुख [ कुंडलिया ]

 604/2025


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

त्रेता युग में विप्र था,दसमुख  जिसका नाम।

ज्ञानवान  शिवभक्त  भी,धरती पर था नाम।।

धरती  पर था  नाम, कर्म कुछ उसका ऐसा।

नीति  धर्म  प्रतिकूल,न  करता मानव वैसा।।

'शुभम्' हुआ बदनाम,जदपि वह धर्म प्रणेता।

हरी   राम  की सीय,  बना  दानव  युग त्रेता।।


                         -2-

खोटे    मानव    कर्म हों, होता पतन अवश्य।

जैसे  दसमुख  विप्र  का,हुआ  नाम अस्पृश्य।।

हुआ नाम  अस्पृश्य,  नहीं  रखते जन  रावण।

मानवता   के   नाम,हुआ हो  ज्यों कोई व्रण।।

'शुभम्' लिया  हठ  ठान,जले स्वर्णिम परकोटे।

उचित   यही   है तथ्य,कर्म क्यों करना खोटे।।


                         -3-

विजयादशमी    पर्व    की,  पावन है यह रीत।

दसमुख तमस प्रतीक है,राम विजय की प्रीत।।

राम   विजय    की प्रीत, युगों से चलती आई।

दसकंधर    का  नाश,  सदा   को  हुई विदाई।।

'शुभम्'  धरा    से एक,शुभद कन्या जो जनमी।

हरण  हुआ  वनवास, मुक्ति   में विजयादशमी।।


                         -4-

माता      जिसकी     कैकसी, एक दानवी नाम।

पिता    विश्रवा  एक  ऋषि,हुआ  पुत्र बदनाम।।

हुआ    पुत्र     बदनाम,  हरण  कर सीता लाया।

अहंकार    में    चूर, क्रूर    दसमुख कहलाया।।

'शुभम्'  कर्म  फल व्यक्ति,इसी जीवन में पाता।

हों   यदि   पिता  सुशील,  भद्र  भी  होवे माता।।


                         -5-

दसमुख    एक   प्रतीक  है,अहंकार का नाम।

रावण    दानव  एक  था,  श्रीलंका   में  धाम।।

श्रीलंका   में  धाम, भक्ति शिवजी की करता।

अहंकार  में    लीन,  कर्म   से   जीता -मरता।।

'शुभम्' सदा मतिमंद,किया करते उलटा रुख।

दुष्कर्मों   का बंध,   बना   रावण   वह दसमुख।।

शुभमस्तु !


02.10.2025● 10.30 प०मा०

                   ●●●

राम को आराम कब है! [ नवगीत ]

 603/2025


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


इन रावणों के

बीच में 

एक राम को आराम कब है!


भ्रष्ट नेता

त्रस्त जनता

अँधियाँ  उड़ते  बगूले

चाहिए 

आधा कमीशन

क्यों न महँगाई वसूले

ओढ़े हुए है

पीत चीवर

प्राण रक्षक मात्र रब है।


खोलता 

अपनी जुबाँ जो

बंद  अब गुर्गे करेंगे

दीवार के पीछे

खड़े जो

घाव शब्दों से भरेंगे

धृष्टता से

बहुल सारा 

देश पूरा एक हब है।


कह रहे हैं

राम वे ही

देश के रावण रँगीले

जय विजय का 

पर्व है ये

दश हरा सब रंग ढीले

हर ओर है

अभिनय अनौखा

जल रही काँचन्य दव है।


शुभमस्तु !


02.10.2025●11.15 आ०मा०

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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

विजयदशमी का संदेश! [ अतुकांतिका ]

 602/2025





©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जनता पर

नेताओं की

विजय हो रही है!

आप ही बताओ

सत्य किधर है ? 

इधर या उधर ?


सस्ताई के सिर

मँहगाई 

चढ़ रही है,

आप ही बताओ

बुराई 

इधर है या उधर?


भले जन पर

अत्याचारी हावी है

क्या कभी सोचा है

अच्छाई किधर है

इधर या उधर?


नारी पर 

दुष्कर्मी अत्याचार करें,

स्वतंत्र घूमें

व्यभिचार भरें,

बता दो आप ही

उचिताई 

इधर है या उधर ?


क्या यही

विजयदशमी की

गरिमा और गुरुत्व है !

असत्य पर सत्य की

बुराई पर अच्छाई की

विजय का औचित्य है?


वाह रे मेरे महान देश

क्या यही है

विजयदशमी का सुसंदेश?

जहाँ नारी  की अस्मिता बची

न बची निरीह जनता,

भ्रष्ट आचरण का साम्राज्य

सर्वत्र छाए हुए गुंडा नेता।


रावण खुलेआम 

घूम रहे हैं ,

और राम ढूंढ़े से भी

नहीं मिलते !

क्या इसी का नाम

विजयदशमी है ?

नाटकों से रावण नहीं

जला करते !


शुभमस्तु !


02.10.2025●9.15 आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...