635/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
नक्कारे
नकारों के बजे
कैसे सुनें हम।
क्यों
सकारों से नहीं
सरोकार कोई
खोजते
जन अटपटा
धूमिल रसोई
स्वप्न अच्छे के
कहो
कैसे बुनें हम।
जानकर कोई
बुरा
करता नहीं है
दृष्टि में हो
दोष
क्या कुछ कहीं है
श्रेष्ठता ही
श्रेष्ठता
कैसे चुनें हम।
कोष की रूई
चुनें
बाती बनाएँ
शब्द को
साकार कर
आभा जगाएँ
बहु नकारों
के लिए
क्या सिर धुनें हम ?
शुभमस्तु !
23.10.2025●10.45 आ०मा०
●●●
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें