630/2025
© शब्दकार
डॉ० भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कोई दीवार नहीं
दर भी नहीं कोई
घुसपैठियों को कोई डर ही नहीं।
पूरब से आओ
या पश्चिम से ठुसो
ये देश नहीं, धर्मशाला है
खाने को मिलेगा
मुफ़्त का राशन
कहीं नहीं यहाँ एक ताला है
नीबू की तरह निचोड़ दो
जहाँ चाहो इसे मोड़ दो
किसी को कोई उजर ही नहीं।
लूटो - खसोटो देश को
बदले रहो निज वेश को
संत बनो या बनो डाकू
बहका कर युवा लड़कियां
लोगों को लगाओ झिड़कियाँ
खुलेआम चलाओ चाकू
सोया हुआ है देश
पूजता हुआ छद्म वेश
जगा मत देना कोई असर ही नहीं।
यहाँ कोई अगड़ा है
उधर कोई पिछड़ा है
सब जातिवादी मूढ़ हैं
सनातनी एक भी नहीं
तनातनी सब जगह रही
कूढ़ गर्दभारूढ़ हैं
पतन का ये दौर है
जन-जन के मन चोर है
सुनाई कैसे देगा इन्हें बजर भी नहीं।
शुभमस्तु !
20.10.2025● 1.45प०मा०
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