मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

ईंटों की दीवार चार थीं ! [ नवगीत ]

 622/2025


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ईंटों की

दीवार चार थीं

तुमने गेह बनाया।


मैं तो शव था

शक्ति तुम्हारी

प्राण फूँकती अनुदिन

रमा तुम्हीं

शारदा तुम्हीं हो

अन्नपूर्णा  प्रति छिन

चूल्हा चौका

यंत्र तुम्हारे

जिनसे नेह बनाया।


एक-एक 

आँसू में बसते

अणुबम और मिसाइल

किले ध्वस्त होते

भू हिलती

कौन नहीं  है  काइल

एक सूक्ष्म

 कण से हे भामिनि

तुमने  देह  बनाया।


संभव नहीं

विरोध तुहारा

जो चाहो करवाओ

बैठ शेर की

पीठ चंचले 

उसको नाच नचाओ

रहा नहीं

अस्तित्व असुर का

क्षण में खेह बनाया।


शुभमस्तु !


15.10.2025● 1.00प०मा०

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