639/ 2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कहते खुद को सनातनी हैं,
इनमें ही तो तनातनी है,
एकसूत्रता के बस नारे,
आपस में ही रार ठनी है।
जातिवाद में खंडित सारे,
अगड़े पिछड़े सब बेचारे,
सनातनी का ओढ़े चोगा,
ऊँच-नीच के खांडे धारे।
आपस में अति भेदभाव है,
बढ़े न कोई यही चाव है,
सनातनी में बने न संगति,
बना हृदय में बड़ा घाव है।
सनातनी कब खुद को झाँकें,
अन्य धर्म के भीतर ताकें,
ईश - भेद का बजता डंका,
ऊँची करते अपनी नाकें।
सनातनी मतलब के पूरे,
पड़े स्वार्थ वे पूजें घूरे,
काग श्वान में पितर वास है,
खाते पूरी खीर जमूरे।
नहीं एकता भाव वहाँ पर,
सनातनी का वास जहाँ पर,
आपस में ही लड़ते रहना,
धर्मों का नित चलता चक्कर।
गीत सनातन के बस गाएँ,
ध्वज अपना ऊपर फहराएं,
सनातनी की भौंह तनी हैं,
करते आज न कल पछताएं।
शुभमस्तु !
24.10.2025●11.45 आ०मा०
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