शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

राम को आराम कब है! [ नवगीत ]

 603/2025


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


इन रावणों के

बीच में 

एक राम को आराम कब है!


भ्रष्ट नेता

त्रस्त जनता

अँधियाँ  उड़ते  बगूले

चाहिए 

आधा कमीशन

क्यों न महँगाई वसूले

ओढ़े हुए है

पीत चीवर

प्राण रक्षक मात्र रब है।


खोलता 

अपनी जुबाँ जो

बंद  अब गुर्गे करेंगे

दीवार के पीछे

खड़े जो

घाव शब्दों से भरेंगे

धृष्टता से

बहुल सारा 

देश पूरा एक हब है।


कह रहे हैं

राम वे ही

देश के रावण रँगीले

जय विजय का 

पर्व है ये

दश हरा सब रंग ढीले

हर ओर है

अभिनय अनौखा

जल रही काँचन्य दव है।


शुभमस्तु !


02.10.2025●11.15 आ०मा०

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