गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

विस्तार [ सोरठा ]

 601/2025


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अनथक    करें  विकास,जीवन को विस्तार  दे।

बिखरे विमल  उजास,सुमन खिलें जीवन  फले।।

अंड     पिंड   ब्रह्मांड,   अंबर  के  विस्तार  में।

सूरज  सोम   अखंड, सबका  नित्य सुवास   है।।


एक   सफल विस्तार,  संतति ही परिवार   का।

जीवन     में   अनिवार,  पढ़ें-लिखें   आगे बढ़ें।।

सागर    अतल   अपार,नदियों   का विस्तार   है।

गंगा-यमुना   धार,  निशि -दिन  ही   बहती  रहें।।


होता     सदा     विकास,  शिक्षा के विस्तार  से।

प्रसरित  दिव्य  उजास, देश मनुज -जीवन  बढ़े।।

फूल   और  फल बीज, कलियों का विस्तार  है।

अद्भुत   अनुपम   चीज,   वंश-बेल  बढ़ती   रहे।।


होता   राष्ट्र - विकास,  सड़कों के विस्तार   से।

मिटे   सकल   संत्रास,समय  बचे गति भी   बढ़े।। 

जानें   सकल   सुजान,   महिमा है विस्तार की।

मानव   बने   महान,  गौरव   गरिमा -वृद्धि  हो।।


घटता    है    परिवार,  किया नहीं विस्तार जो।

अकथनीय   सुख -सार, शिक्षा  अतुल प्रकाश है।।

चिंतन      बने    महान,करें सोच - विस्तार   तो।

करें   खोल   उर   दान,छोड़े   लघुता बुद्धि   की।।


चिंतन     यही   महान,  वसुधा  ही परिवार   है।

तनता जगत -वितान,जन -जन का विस्तार ये।।


शुभमस्तु !


02.10.2025 ●8.00आ०मा०

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