गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

पैसे के रथ पर [ नवगीत ]

 600/2025


           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गोल - गोल 

पैसे के रथ पर

चलता है संसार।


गोल -गोल ही

पहिए उसके

गुम्बद   गोल-मटोल

बैठा रथ पर

नहीं जानता

धन-रथ का क्या मोल

उदय-अस्त हो

सूरज उससे

छलता है संसार।


दो रोटी की

खातिर करता

कितने पाप जघन्य

मानवता को

रखे ताक पर

बना हुआ नर वन्य

देख - देख 

अन्यों का पैसा

जलता है संसार।


रिश्ते-नाते

धर्म -कर्म में

पैसे का ही काम

ब्याह-बनिज

श्मशान घाट तक

सबका पैसा राम

आदि मध्य 

 सबमें ही पैसा

ढलता भी संसार।


शुभमस्तु !

01.10.2025● 9.30 आ०मा०

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