600/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
गोल - गोल
पैसे के रथ पर
चलता है संसार।
गोल -गोल ही
पहिए उसके
गुम्बद गोल-मटोल
बैठा रथ पर
नहीं जानता
धन-रथ का क्या मोल
उदय-अस्त हो
सूरज उससे
छलता है संसार।
दो रोटी की
खातिर करता
कितने पाप जघन्य
मानवता को
रखे ताक पर
बना हुआ नर वन्य
देख - देख
अन्यों का पैसा
जलता है संसार।
रिश्ते-नाते
धर्म -कर्म में
पैसे का ही काम
ब्याह-बनिज
श्मशान घाट तक
सबका पैसा राम
आदि मध्य
सबमें ही पैसा
ढलता भी संसार।
शुभमस्तु !
01.10.2025● 9.30 आ०मा०
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