रविवार, 24 मई 2020

नर से भारी नारी [ व्यंग्य ]


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✍ लेखक © 
 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 
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                   यह सर्वविदित है कि रामचरितमानस लिखते समय उसके प्रारम्भ में ही महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने इष्ट वंदना के साथ -साथ दुष्ट वंदना को भी प्रमुख स्थान दिया है: बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ, जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ। और ,  बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना।। इसका मतलब यह कदापि नहीं कि मैं नारियों को साहित्य में कोई निम्न स्थान पर रखता हूँ।मैं उनका उचित मान - सम्मान देता हूँ।

               अद्यतन शोधों से यह आश्चर्यजनक निष्कर्ष प्राप्त हुए हैं कि कहानियाँ गढ़ने /लिखने में महिलाएँ पुरुषों के समान नहीं हैं, वरन उससे भारी ही हैं।अन्य स्थानों पर जैसे नर से भारी नारी है,वह मात्र राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के कहने से ही भारी नहीं हो गई, वह तो पहले भी भारी थी , आज भी भारी है और भविष्य में भी भारी ही रहेगी। व्याकरण हो या 'विवाहकरण' दोनों ही नारी को नर से भारी बनाते हैं। व्याकरण के अनुसार नर में दो औऱ नारी में स्प्ष्टत: चार मात्राएँ होती हैं। 'विवाहकरण' के बाद नारी नर से कितनी अधिक भारी हो जाती है , इस पर अभी शोध होना शेष है।पर इतना अवश्य है कि वह नर से कई गुना भारी हो जाती है। उस पर पत्नी , गृहिणी , भार्या, जाया, माया , माता, वामा , जननी, सजनी , कामिनी, भाभी, बुआ ,बहन , कांता , रमणी, प्रेयसि , सखी , मित्र , सचिव, आदि की जिम्मेदारियां उसके भार को बढ़ाने का काज करती हैं।

                              असली बात जो कहने की है ,उसकी भूमिका ही जब इतनी भारी भरकम हो जाएगी , तो निश्चित रूप से समझ लीजिए कि नर से भारी नारी है ही। अब इस बात पर यदि नरों को कोई ईर्ष्या पैदा हो, तो हो। जो बात है ,उसको कहना कोई गुनाह तो है नहीं। 'विवाहकरण' के बाद बेचारा पुरुष तो एक नारी के पीठ पर सवार हो जाने पर औऱ दुबला-पतला ,क्षीणकाय औऱ भार में हल्का हो जाता है। विवाह पूर्व वह केवल अपना ही भार उठाता था, अब भार्या का भार उठाते - उठाते उसकी कमर भी कमान हो जाती है। जिस पर रखकर वे तीरों का संधान किया करती हैं।

                हाँ, तो मैं यह कह रहा था कि अब मुंशी प्रेमचंद का युग नहीं । अच्छा हुआ अब वह युग चला गया। यदि वह होते या उनके युग के कथाकार आज होते तो उन्हें नारियों के भारीपन से ईर्ष्या अवश्य होती। आज जितनी लघुकथाकार नारियाँ हैं , उतने पुरुष नहीं हैं। मेरी सोच के अनुसार कहानी गढ़ने में जितनी कुशल एक नारी हो सकती है , उतना कुशल पुरुष नहीं हो सकता। कहानी नारी का सहज गुण है।मैं तो इसीलिए नारियों से सोलह फिट की दूरी बनाकर रखता हूँ। पता नहीं कौन नर से भारी नारी मेरी ही लघुकथा , कहानी, उपन्यास बना दे।इसलिए मैं उनसे डरता हूँ।कथात्व का सहज संस्कार रचाये-बसाए हुए नारी के लिए कहानी गढ़ना एक सहज कार्य नहीं , उसकी प्रकृति है।इसीलिए तो वे सास , बहू , पड़ौसिन, अपनी ननद की कहानियां सहज रूप में सुनाकर अपना और दूसरों का मनोरंजन करती रहती हैं। उनकी यही सहजता जब शब्दों के रूप में कागज पर साकार होती है , तो वह साहित्य हो जाता है।

                   नारी कभी 'बोर ' नहीं हो सकती। ये अलग बात है कि वह सारे मुहल्ले को , अपने पति और परिवार को भले बोर करती रहे। उसके मुखर सहित्य में जो कभी - कभी कानों में भी भरा हुआ दिखाई देता है,   कभी उदासीनता या बोरियत जैसी कोई बात नहीं परिलक्षित होती।उसका कारण आदि काल से चला आ रहा रस , जिसकी चर्चा पता नहीं किस अज्ञान के कारण तब से अब तक के बड़े -बड़े आचार्य और विद्वान नहीं कर पाए। वह सर्वकालिक रस है :- " निंदा रस"।इस रस के आनंद में निमग्न रहते हुए उन्हें अकेलापन भी कभी नहीं खलता। प्रोषितपतिका की अवस्था में भी उन्हें वह रस आनन्द विभोर कर उसकी चिंता का हरण कर लेता है। वास्तव में नर से भारी नारी है, वह एक ऐसी कलाकार है कि जिसमें पुरुष से अनगिनत गुना कलाओं की व्यपकता है।

 💐 शुभमस्तु !

 23.05.2020 ◆12.15 अपराह्न।

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