बुधवार, 29 दिसंबर 2021

खुशबू छिपे न इत्र की 🍾 [ दोहा गीतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌸 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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खुशबू छिपे न इत्र की,महक उठा परिवेश।

नेताजी के वरद जो,फिर क्यों होता क्लेश।।


वर्जित  है अति ही सदा, मोरी  ढूँढ़े    नीर,

तोड़ कुलाबे बह चला, डूबे  नख  से  केश।


एक- एक  घर में   भरा,सोना रजत  अपार, 

अहि-रक्षित धन संपदा,बचा न सके धनेश।


रोटी, सब्जी , दाल  से,भरता सबका    पेट,

जब  तन  अपना छोड़ते,संग न  जाता लेश।


कभी-कभी अति सादगी, बनती विष आहार

परदे  में क्या  हो रहा,जाना नहीं      दिनेश।


अहंकार  की   नाव  में,  बैठे  हुए     सवार,

पहचानेगा   कौन  नर, सँग में रहें    फ़णेश।


कर-  चोरी  के  चोर  का ,हाल  हुआ बेहाल,

'शुभम'सियासत धर रही,नित्य नए बहु वेश।


🪴 शुभमस्तु  !

२९.१२.२०२१◆२.०० 

पतनम मार्तण्डस्य।

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