गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

आम आदमी 👣 [ अतुकांतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

👣 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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 बहुमत आम का

भोग कुछ खास का,

आम मात्र चुसने के लिए

और खास चूसने के लिए,

कुछ जबरदस्त खास,

कुछ जबर्दस्ती खास,

आम बने रहना

कोई नहीं चाहता,

फिर भी आम ही आम

जिनके बिना खास बेकाम।


खास का आम से

कुछ मतलब ही खास,

अन्यथा कहाँ है

खास को कोई आम 

आता है कब रास,

आम के बिना 

चलती नहीं

 नेता जी की  श्वास!

वही तो है 

उनका च्यवनप्राश।


खास के

सिर की टोपी 

आम आदमी के 

चरणों में,

उसके सिर पर

बैठ जाने के लिए,

धीरे -धीरे उसे 

चूस जाने के लिए,

दिखावटी रूप में

अपनाने के लिए,

जबकि होता है

सभी कुछ 

आम के ही किए।


आकाशगामी 

हेलीकॉप्टर आम के

सिर पर उड़ता है,

उसी के धन से

उसका पेट्रोल भी

भरता है,

पर मूढ़ आम आदमी

झूठी सराहना  में

मरता है,

नए - नए देखता वह

नित सपने ,

जिसको खास

 नहीं समझता कभी अपने!


आज की नई परिभाषा

किसी 'खास' की:

न शिक्षा 

न कुछ ज्ञान,

चरित्रहीनता की शान,

गुंडागर्दी की उठान,

किसी दल के

झंडे की पहचान ,

बनाती खासियत का वितान,

आम कोई 

रहना ही नहीं चाहता,

विवशता है कि

वह आम आदमी है,

वह  नहीं जानता कि

अभी बची हुई

वहीं तो आँख,

 उर में 'शुभम' नमी है।


🪴 शुभमस्तु !

२२.१२.२०२१◆१०.४५आरोहणं मार्तण्डस्य।

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