शनिवार, 30 दिसंबर 2023

राम - से राम ● [ अतुकांतिका ]

 598/2023

           

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

●© शब्दकार

● डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

राम - से  राम 

सिया-सी सिया

न उनसा कोई और

धरा पर जिया।


मानवता के

आदर्श राम

शत -शत प्रणाम

प्रणिपात,

ग्रहण हम करें

मनुजता 

जीवन का प्रभात,

विशिष्ट अवदात।


यह देह देश मम

अयोध्या मानस ,

बसे  हैं  राम  जहाँ

और भी ठौर कहाँ!

खिले हैं कितने उपवन।


अजर अमर 

आदर्श 

राम के युग-युग,

भले आज है

दुनिया में कलयुग

बनाएँ त्रेता ये युग।


मनमानी को नहीं

राम राज कहते हैं,

राम वही हैं

जो सीमा तक 

अति -आचार

सहन करते हैं।


कूटनीति को त्याग

जगाओ रामनीति ही,

राजनीति मत कहो

सत्य को नित अपनाएँ

राम - आदेश नीतिगत

आदर्श बनाएँ।


'शुभम्' असंभव नहीं

कभी कुछ,

काम-कामिनी से 

दूरी का किया न

 तुमने अपना रुख,

तो राम रहेंगे

बस पोथी के

पन्नों में बंद,

उधर जारी ही रहेंगे

नेताओं के छल-छद्म,

बाँटते भारत - रत्न

धातु के पद्म।


●शुभमस्तु !


29.12.2023●11.45आ०मा०

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...