शनिवार, 16 दिसंबर 2023

इच्छा● [ कुंडलिया ]

 537/2023

     

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●© शब्दकार

●  डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                     -1-

इच्छा -  सागर  देह में,उमड़ रहा दिन -  रात।

मन में उठे   हिलोर -  सी,कही न जाए  बात।।

कही  न   जाए  बात, कहें उतनी कम   होती।

इच्छा उर  के  बीच,बीज  नित अनगिन बोती।।

'शुभम्'  खो गया चैन,हृदय होता न   उजागर।

पूरी   होती   एक , उठे   फिर  इच्छा - सागर।।


                        -2-

मानव - मन में  उग  रहे,  नित इच्छा   के   बीज।

जब  तक   बने  न  पेड़ वे, लगने लगीं  पसीज।।

लगने   लगीं    पसीज,   और  इच्छाएँ    सारी।

मुर्झातीं  कुछ  एक,  बहुत  कुछ जातीं    मारी।।

'शुभम्'  न माना  हार,नहीं  झुकता  है   दानव।

रक्तबीज  -  सी   नित्य,उगाता इच्छा    मानव।।

                        -3-

गागर   में  जब  छेद  हो,रुके न जल   की  बूँद।

मानव - मन  वैसा  बना , कौन सका   है   मूँद।।

कौन सका है  मूँद,अपरिमित इच्छा - जल  से।

घटता - बढ़ता   इंदु, बना मानस की   कल   से।।

'शुभम्' न सीमित बिंदु,रिक्त पल -पल हो सागर।

जीवन   का  हो  अंत,  नहीं भरती यह     गागर।।

                       -4-

सबकी   इच्छा   है यही, रहे  जगत   में    शांति।   

रूस,  चीन   या  पाक हों,नहीं चाहते   क्रांति।। 

नहीं  चाहते   क्रांति,आग फिर कौन   लगाता।

रहे   जमालो  दूर, खड़ी  फिर पास  न   आता।।

'शुभम्'शांति किस ठौर,काँपती दुबकी जग की।

बना  क्रूर   सिरमौर, उचित  इच्छा है    सबकी।।


                         -5-

नेता  की  इच्छा  नहीं, करना  देश - विकास।

नारा  ही   देता   रहे, और  न  कोई    आस।।

और   न   कोई  आस, झुनझुना बजते रहना।

इतना  ही  बस  काम, तिजोरी भरता  गहना।।

'शुभम्'  दाम   का  दास,नहीं  कुछ  नेता  देता।

झोपड़ियों     का  वास, रहे  महलों   में   नेता।।


●शुभमस्तु !


15.12.2023●5.00प०मा०

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