शनिवार, 16 दिसंबर 2023

उड़नखटोला ● [ बाल कविता]

 535/2023

          

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

●©शब्दकार

● डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

देखो      उड़नखटोला     आया।

घर्र -  घर्र  कर    नभ  गरजाया।।


छत  पेड़ों    के     उड़ता    ऊपर।

धूल   उड़ाता     भारी    भू   पर।।


लगता   इसमें   जगह  न  इतनी।

बैठ  सकें   ऑटो   में    जितनी।।


दो  ही   लोग    बैठ    पाते   हैं।

रस्सी  से   बँध   कस  जाते हैं।। 


  घर्र - घर्र    से    कान  फोड़ता।

  सरपट  भू  पर  दिखा दौड़ता।।


  सैर -  सपाटे  को    है   अच्छा।

लगता  है  जहाज   का   बच्छा।।


'शुभम्'  निकट  से हमें दिखाएँ।

चढ़ें    खटोले पर   उड़   जाएँ।।


●शुभमस्तु !


14.12.2023●4.30प०मा०

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...