770/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
दयनीय क्यों हो
वृद्धता
जो हाथ दो जोड़े खड़ी।
दीनता में
हीनता के
बोध का संचार क्यों
जब देह हो
कमजोर तो
जननी बने बेजार यों
देह पर कपड़े
कुरुचि के
आपदा में ज्यों बड़ी।
हालात से
मजबूर हैं सब
बदलना संभव नहीं
वक्त के ही
सामने
घुटने टिकाए सब यहीं
जिंदगी
लेती परीक्षा
व्यक्ति की कैसी कड़ी।
प्रभु उन्हें
सामर्थ्य दे
जो व्यक्ति यों मजबूर हो
पास में
अपने सदा हों
हो सगा क्यों दूर हो
बुद्धि तन-बल भी
सदा हो
हो न यों जन की घड़ी।
शुभमस्तु !
23.12.2025●2.15आ०मा०
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