771/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
पूस
होली खेलता है
साँझ से ही रात भर।
आकाश से
पिचकारियाँ
चलतीं विरल-सी ओस की
कोटरों में
गिलहरियाँ
सोने लगीं संतोष की
ओढ़ चादर
कोहरे की
साँझ से ही रात भर।
घोसले में
दुबक
पंखों में छिपी जा फ़ाख्ता
जा रहा है
गैल में जो
दिखता नहीं कुछ रास्ता
पेड़ के नीचे
टपाटप
साँझ से ही रात भर।
बाजरे के
बूलरे पर
श्वेत पाला जा जमा
भूनता है
शकरकंदी
आग में रोजी कमा
देखो अलावों में
न अग्नि
साँझ से ही रात भर।
शुभमस्तु !
23.12.2025●11.15आ०मा०
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