सोमवार, 22 दिसंबर 2025

जिंदगी की दौड़ [ नवगीत ]

 743/2025


          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जिंदगी की दौड़

इतनी

तेज कब थी ?


गति बढ़ी है

सौ गुनी

पर वक्त कम है

आदमी

इस मामले में

बे-शरम है

बैलगाड़ी ही 

भली थी

एक सम थी।


दृश्यता भी

शून्य है

गहरा कुहासा

दौड़ता है

आदमी 

क्यों बेतहासा

फट रही है

देह जैसे

एक बम थी।


देख सुन

ये हादसे

मन व्यथित भारी

दोष 

औरों पर मढ़ें

बढ़ती बिमारी

ढूंढ़ते हैं

दुर्व्यवस्था

एक खम थी।


शुभमस्तु !


17.12.2025 ●12.00मध्याह्न


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