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©व्यंग्यकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
'नाम' बड़े काम का है।नाम न हो तो पहचान कैसे हो!वह नाम ही है जो दुनिया में नाच नचाए फिरता है। व्यक्ति या वस्तु के बाद वह नाम ही है,जो बचता है। कुछ लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है। मान्यवर! नाम में तो बहुत कुछ रखा है, वह नाम ही तो है जिसके लिए लोग मर मिटते हैं। नाम के लिए तो वे न जाने क्या-क्या करते हैं! राम के नाम से पापी भी तरते हैं।अंत काल में मुँह से राम का नाम आ जाए इसके लिए कपड़े भी रँगते हैं। कोई कोई तो राम के नाम से बने रह जाते सिर्फ मँगते हैं।कोई राम नाम लेकर किसी का माल किसी की नारी तकते हैं। 'राम नाम जपना,पराया माल अपना ', और 'मुँह में राम बगल में छुरी' जैसी कहावतें बन गईं।
प्रत्येक माँ बाप अपनी संतान का नाम सोच समझकर रखते हैं। कोई कोई तो अत्यंत लाड़ में ऐसा भी नाम रखते हैं कि बड़े होने पर नामधारी को अपना नाम बताने में भी शर्म आती है। जैसे एक नाम है घमंडी लाल । श्रीमान घमंडी लाल यादव जी अपना नाम जी.एल.यादव बताया या लिखा करते थे। वे न शर्माते थे और न ही डरते थे। नाम का भी एक अर्थ होता है,जिसका बिम्ब उच्चारण कर्ता के मन पर असर करता है। यदि किसी का नाम पकौड़ी लाल रख दिया जाए तो आदमी से पहले तेल में तली हुई गर्मागर्म पकौड़ी का बिम्ब सामने प्रत्यक्ष होता है। यही कारण है कि एक से एक छाँट कर नाम रखे जाने का चलन है।
कहते हैं कि व्यक्ति पर उसके नाम का प्रभाव कुछ न कुछ अंश में अवश्य पड़ता है। यदि गरीबदास आजीवन गरीब रह जाए तो उसका क्या दोष ! यह तो उसके माँ बाप ही जानें कि उन्होंने क्या सोच समझकर अपने बेटे का नाम रखा। कुछ नाम बड़े ही अतिशयोक्ति पूर्ण रख दिए जाते हैं ,जैसे अमर सिंह। रख लो नाम अमर सिंह,किन्तु वह अमर तो नहीं होगा। लक्ष्मी को भीख माँगते हुए देखा गया है। गेंदा लाल में धतूरे की भी गंध नहीं है। गुलाब सिंह में कहीं कोई गुलाब तत्त्व नहीं है। तो राम सिंह में यदि रामत्व न हो तो आश्चर्य मत कीजिएगा। लखन लाल और भरत लाल अपने से बड़े राम को जमीन का एक इंच टुकड़ा भी नहीं देना चाहते और दुर्योधन की सर्वांश भूमिका का निर्वाह करते हैं।
हमारे अतीत में ऐसे भी कुछ नाम हो चुके हैं,जिन पर कोई भी अपनी संतान का नाम नहीं रखना चाहता।जैसे रावण,कुम्भकर्ण,विभीषण, कंस, सूर्पणखा, पूतना, धृतराष्ट्र आदि। तभी तो कहा गया है कि बद अच्छा बदनाम बुरा। नाम अच्छा ही रहे। वैसे आदमी शक्ल से चाहे उलटा तवा हो ,किंतु नाम गोरे लाल ही जमता है।एक बार के लिए श्याम सिंह श्याम हो जाएँ तो कोई बात नहीं। कांति देवी क्रांति की देवी नहीं होनी चाहिए।
अब नए फैशन के अनुसार अत्याधुनिकता ने भी नामों के घर में पाँव पसार लिए हैं। बच्चे के गर्भ में आते ही पूर्व नामांकन हो जाता है। लड़का हुआ तो ये और लड़की हुई तो ये। यह आधुनिकों का जमाना है, कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता।ऐसे-ऐसे नाम रखे जाते हैं जिनका मतलब शब्दकोश में तो क्या गूगल बाबा और ए आई भी नहीं जानते। नाम के भाव और अर्थ के नाम पर वे भी दाँतों तले अँगुली दबा लेते हैं।कुछ लोग अपना मज़हब और धर्म छिपाने के लिए ऐसे नाम रखते हैं ,जिनसे यह पता नहीं लगता कि वह कौन है। एक व्यक्ति ने अपने लड़के का नाम प्रिंस रख लिया ,अब आप इससे उस लड़के के धर्म और मजहब का पता नहीं लगा सकते।
जमाने ने नाम रखने के ट्रेंड को भी बदल दिया है। उकाव लुकाव सुरखाब जैसे नाम भी नामावली में शोभायमान हैं। जहाँ पहले लड़कों के नाम देवताओं और ईश्वर परक हुआ करते थे और लड़कियों के नाम देवियों और नदियों आदि के आधार पर रखे जाते थे। अब वह पिछले नहीं पिछड़ेपन की निशानी हो गए हैं। जब तक नाम लेने में जीभ लभेड़े न खा जाए ,तो वह नाम ही क्या! नामों की अनन्त कहानी है। यहाँ भाषा की बात करना बेमानी है। बोलने के लिए ईरानी तूरानी कुछ भी रखा जा सकता है। एक समय था जब पत्नियाँ अपने पति का नाम नहीं लेती थीं। ऐसी ही कुछ मान्यता थी कि पति का नाम लेने से पति की उम्र कम हो जाती है। किंतु अब ?अब क्या ? अब तो सब बदल गया है,जिस जमाने में पत्नी ही पति को काटकर ड्रम में पैक कर डालती है, उसे पति की उम्र की क्या चिंता ! कल मरे तो अभी मर जाए !उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए प्यार के नाम पर वह उसे बाबू जानू जैसे संबोधनों से बहकाती है और करती वही है,जो उसे करना होता है।अब तो पत्नी के द्वारा पति का नाम लेने का भी फैशन है।वह पुरानी बातों को दकियानूसी मानती है। उसकी दृष्टि में उससे अधिक अक्लमंद कोई नहीं। पता ही नहीं लगता कि वे पति- पत्नी हैं या पुरुष- स्त्री मित्र अथवा भाई- बहन ? नाम के नाम पर सारी अभेद्य दीवारें टूट गई हैं। किसी अन्य से बात करते समय उसके पति 'वे' हुआ करते थे ,आज वे सर्वनाम से संज्ञा बन चुके हैं। नाम की तो धज्जियाँ ही उड़ा दी गई हैं। नाम के नाम पर एक मखौल सा शेष रह गया है। नाम ही नहीं रहा तो व्यक्ति का अस्तित्व स्वतः ही प्रश्नवाचक चिह्न बन गया।
शुभमस्तु !
30.12.2025● 1.30 प०मा०
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