शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

अच्छा तो अब तुम जा रहे हो ! [ आलेख ]

 785/2025 

 

 

 ©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 अच्छा तो अब तुम जा रहे हो दो हजार पच्चीस ! कोई बात नहीं। एक न एक दिन तो सबको ही जाना है।जो आया है ,वह जाएगा भी ; यह नियति का अनिवार्य सत्य है। जब तक एक जाएगा नहीं,तब तक अगला आएगा भी नहीं। नियति को इस विषय में किसी से कोई लगाव भी नहीं। लगाव रखे भी कैसे, वह स्वेच्छा से किसी को एक पल के लिए भी विलंबित नहीं कर सकती। यह उसका निर्मोह भी नहीं, नियम है ;जिसका अनुपालन उसे अनिवार्य रूप से करना ही है। 

  जाने वाले तेरी शुभ विदाई और आने वाले का स्वागत है,वंदन है,अभिनंदन है। तुम जा तो रहे हो; पर सँभल कर जाना।जाते-जाते कुछ ऐसा मत दिखाना कि तुम्हें सदियां कोसती रहें।कहते हैं कि जिसका अंत भला हो उसको भला ही भला कहा जाता है। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी भलाई में कुछ भी अनभलाई हो। 

 अब तुम्हारी उलटी गिनती शुरू हो गई है। पाँच ,चार ,तीन, दो , एक और बस विदाई नेक।और इकतीस दिसम्बर का अंतिम दिन।देख रही दुनिया हर आदमी गिन- गिन।जाते जाते अच्छी नहीं लगती कुछ किन-मिन,भिन-भिन। जैसे रहे वर्ष भर घुलमिल ,वैसे ही अब भी रहना है हिल मिल।व्यतीत हो ही रहा समय तिल - तिल।इसलिए हँसते मुस्कराते रहो खिल -खिल। 

 तुम तो  जानते हो कि शुभम् शब्दों का एक अदना-सा खिलाड़ी है।वैसे वह अपने क्षेत्र में स्वयं को समझता अनाड़ी है।भले ही उसके परित: रचनाओं की बड़ी झाड़ी है,झाड़ है कि झंखाड़ है, यह तो तुम ही जानो।अपने पिछले इस तिरेसठ वर्ष के साहित्यिक यात्रा अंतराल में बहुत कुछ देखा है,पाया है ।जो भी मुझे भाया है ,तुम्हारे साथ रहने तक यात्रा के 45 पत्थर पार कर आया है। तुम्हारे विदाई लेने तक वह अपने जीवन के 74 वर्ष भी पूरे करने की सोचता है। एक ही वर्ष में 15 पुस्तकों का प्रकाशित होना तुम्हारी बड़ी उपलब्धि है।भविष्य तो समय के हाथों में है कि कितनी दूर तक जाना है ,भला कौन जाने। कुल मिलाकर तुम्हारा शुभम् अति प्रसन्न है और माँ सरस्वती के काव्य रूपी वरदान पर गदगद है। कितने पुण्य करने पर मानव जन्म मिलता है और उसमें भी कवि होना तो कितने अश्वमेघ यज्ञों का सुफल है;कहा नहीं जा सकता। आज यह अकिंचन शुभम् इसी चिंतन में लीन है कि वह भी अथाह साहित्य- सागर की एक नन्हीं सी मीन है।

 मैं नहीं जानता कि जो कुछ भी लिखा है या प्रकाशित हुआ है ,वह साहित्य की कसौटी पर किंतने कैरेट का शुद्ध सोना है। पर इतना तो देखा है कि सोने को परखने की कसौटी सबकी समान नहीं होती। कुछ ऐसे भी पारखी हैं,जो केवल कचरा ही ढूंढते हैं,और शुद्धता को पीछे छोड़ते हैं। कुछ बिना कसौटी पर कसे हुए वाह! वाह !! करते हैं और कोई बुराई न मिले इससे डरते हैं।एक अच्छे सहित्यविद् के लिए ये सबसे बड़ा खतरा हैं ,क्योंकि अंधकार में ही इन्होंने साहित्य को दिया छितरा है।साहित्य का सही रूप तो उसी कसौटी पर निखरा है, जो शूल को शूल और फूल को फूल बताने पर उतरा है। 

 कल के बाद अगले 28 दिसम्बर को ही तुम्हारे साथ जीवन का चौहत्तरवां शरद कहूँ या वसंत ; मुझे अमृत वर्ष में ले जाएगा और 2026 के नए शब्द-सुमन सजाएगा। मैं आभारी हूँ तुम दोनों का और उन अतीत व्यतीत का सबका जो पीछे नींव के पत्थर बन गए। 'निज कवित्त केहि लाग न नीका' की बात ध्यान में रखी जाए तो मुझे भी अपना सम्पूर्ण साहित्य चाहे वह काव्य हो,कहानी,नाटक, व्यंग्य या आलेख ;सब कुछ नीका लगता है। अब वह पाठकों की दृष्टि में सरस हो या फीका। कुल मिलाकर शुभम् एक छोटा सा साहित्याक्षर है, डुगडुगी बजाकर मेले या झमेले में हँसाने वाला जोकर नहीं । जो कहता है वह सच ही कहता है, चाहे वह व्यंग्य हो या कविता।सबकी खबर लेता है और सबको खबर देता है।पर सच कहने से नहीं चूकता। जिसे पढ़कर तिलमिलाने वाला तिलमिलायेगा और अन्य पाठक हँसें या न हँसें, शुभम् इसकी परवाह नहीं करता।सत्य ही उसकी कसौटी है,इसे तो तुम अच्छी तरह से जानते हो दो हजार पच्चीस। अब आगे आने वाले दो हजार छब्बीस को भी उसका परिचय देते जाना। शेष शुभम् स्वयं सँभाल लेगा। 

 शुभमस्तु ! 

 26.12.2025 ●11.15 आ०मा०

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