बुधवार, 24 दिसंबर 2025

रूठता भी वही [ नवगीत ]

 777/2025


          


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप  'शुभम्'


रूठता भी वही

जिसका

मनावनहार हो।


जंगलों में 

रह रहा जो

रूठता किससे भला

आप ही है

कर्म कर्ता

क्या करेगा मनचला

आप ही है

पाल्य पालक 

नम्र या अनुदार हो।


कौन किससे

तुष्ट कितना

स्वार्थ का संघात है

कौन किससे

रुष्ट कितना

आपसी संवाद है

टूटता

बंधन वहीं जब

दो दिलों में प्यार हो।


जगत के

बंधन गठीले

कब तलक किसको पता

एक पल में

टूट जाएँ 

वक्त   देता   है   जता

फूटता 

साझा घड़ा तब

टूटे दिलों में  रार हो


शुभमस्तु !


24.12.2025● 1.30प०मा०

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