सोमवार, 22 दिसंबर 2025

कंबल ओढ़ाना लाज़मी [ नवगीत ]

 746/2025


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


घाम को

आराम का

कंबल ओढ़ाना लाज़मी।


शॉल लेकर

पौष आया

सिहरता-सा कोहरा

ओढ़ कर 

देखा  जभी मैं

सिहरता तन मोहरा

थरथराई

देह सारी

कंप रहा है आदमी।


ताम्रचूड़ी घोष से

आबाद हैं

गलियाँ कई

दे रहीं

अंडे  सुनहले

पत्नियाँ उनकी नई

आहार में 

जिनको उड़ाता

आदमी ये आलमी।


बाँधकर मफ़लर

उठे हैं

आज सूरज देवता

आदमी जा

घाम में ये

नव ऊष्मा को सेवता

सोचता है

रात में भी

घाम होती दायमी।


शुभमस्तु !


17.12.2025● 2.15 प०मा०

                    ●●●

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...