756/ 2025
[घर,भवन,सदन,धाम,आवास]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
है समान सबकी यही,एक कहानी जान।
माटी के चूल्हे मिलें, घर-घर एक समान।।
दाल बराबर जानते ,घर की मुर्गी मित्र।
यहाँ वहाँ सर्वत्र ही, मिलते यही चरित्र।।
भवन बने बहुमंजिला, रहते धनिक अनेक।
किंतु नहीं अनिवार्य है,सब में मिले विवेक।।
भवन बने रह जायँगे, जब छूटेंगें प्राण।
रक्षा कर लो धर्म की ,हो सब ही म्रियमाण।।
देह सदन है कर्म का, करें सदा शुभ काज।
एक दिवस उठना यही , सजा शीश पर ताज।।
बना सदन दृढ़ ईंट से, चमचम चमके देह।
अमर नहीं जग में सदा, करे बिना नव नेह।।
तीर्थ किए बहु धाम के, मिला नरक का धाम।
सत्य कर्म क्यों त्याग तू,हुआ जगत से वाम।।
देह - धाम सबसे बड़ा, दिया न उस पर ध्यान।
मानव को समझा नहीं, रहा बाँटता ज्ञान।।
रहता जिस आवास में, उसको सजा सँवार।
मत औरों के गेह पर, कर पाहन की मार।।
वही सुखद आवास है,प्राप्त जहाँ सुख शांति।
रहना उसमें है वृथा,जहाँ मिले नित क्लांति।।
एक में सब
सदन धाम आवास घर,भवन सभी बेकार।
जब तक शांति न सब्र हो,नर जीवन निस्सार।।
शुभमस्तु !
20.12.2025●10.15 प०मा०
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