सोमवार, 22 दिसंबर 2025

भुनी शकरकंदी [ नवगीत ]

 748/2025


            


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भुनी शकरकंदी

उपलों में

 महक रही है।


स्वाद अलग ही

शकरकंद का

किसे न भाए

जब नथुनों में

महक घुसे तो

रसना भर आए

घोल दूध में खीर बनाई

तबियत 

लहक रही है।


भुने हुए हैं

आलू ताजी

नमक मिर्च सँग खाए

भाप निकलती

गर्म-गर्म जब

जीभ जले ललचाए

उधर चाय की

भट्टी 

देखो दहक रही है।


नहा ताल में

टेढ़ामेढ़ा

हरा सिंघाड़ा

आलू के संग

ताल मिलाता

झंडा गाड़ा

धनिया 

हरी मिर्च की चटनी

चहक रही है।


शुभमस्तु !


17.12.2025● 4.45प०मा०

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