सोमवार, 22 दिसंबर 2025

कर्मशील नर चाहता [दोहा गीतिका]

 765/2025


            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कर्मशील नर  चाहता, सदा करे कुछ काम।

कुछ ऐसे  मानव यहाँ,  मात्र   चाहते  नाम।।


नीड़  त्याग बाहर गए,भोर  हुआ  सब कीर,

पल भर भी करते नहीं,सब विहंग आराम।


दिवस बनाया काम  को,सोने को शुभ रात,

भानु  हुए जब अस्त तो,हुई सुबह से शाम।


पौष   मास का शीत है,सघन कुहासा    सेत,

छाया  चारों  ओर   है, दिवस  करे  विश्राम।


तजते  नहीं   लिहाफ को,थर-थर  काँपे देह,

नहीं मिले जब वृद्ध को,दिन को उजली घाम।


लगे   हुए  मजदूर   हैं, श्रमरत व्यस्त अनेक,

उन्हें  चाहिए  काम के, नित्य दिहाड़ी दाम।


'शुभम्' शीत  हेमंत    का,  देता  है   जब कष्ट,

शिशु चिपके जा अंक में,माँ का आँचल थाम।


शुभमस्तु !


22.12.2025●5.15 आ०मा०

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