सोमवार, 29 दिसंबर 2025

नमस्ते [ आलेख ]

 788/2025

         

                    

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

नमस्ते और चाहे कुछ भी हो,किंतु मेरी अपनी सोच के अनुसार वह एक भाव है,सहृदयता है, विनम्रता है,उदात्त चेतना है,और भी बहुत कुछ है। वे कौन-कौन सी स्थितियाँ परिस्थितियाँ हैं;जब एक व्यक्ति दूसरे को नमस्ते करता है। मानवीय संवाद के श्रीगणेश और मन के सद्भाव का एक ऐसा प्रतीक ,जो मन की गूढ़ ग्रंथियाँ खोल देता है।हमारे आपके परस्पर नमस्ते करने के भी कुछ कारण होते हैं,हो सकते हैं। प्रायः हम अपने परिचितों को नमस्ते करके उनके प्रति हार्दिक विनम्रता और अपनी सहृदयता प्रस्तुत करते हैं। नमस्ते सकारण भी है और अकारण भी है। वह एक औपचारिकता भी है और शिष्टाचार भी। 

एक लघुकाय शब्द : 'नमस्ते', कितना सार्थक और भेदपूर्ण।शब्द एक  और अर्थ अनेक, भाव अनेक।सर्वथा नेक ही नेक। चाहे छोटा बराबर वाले से करे या बड़े से, सर्वोपयोगी है।एक बार किसी सरल व्यक्तित्व को नहीं भी करे,किंतु टेढ़े और जो किसी रूप में हमारे लिए हानिप्रद हो सकता है,उसे तो नमस्ते न करना अथवा उसकी उपेक्षा करना खतरे से खाली नहीं है।ऐसा कौन शख़्स है जो शनिदेव के स्वभाव और गति से परिचित नहीं है।व्यक्ति उनसे प्रेम या भक्तिवश नमन नहीं करता ;  भयवश करता है।जिसकी दृष्टि ;वह भी वक्र दृष्टि भी मारक और संहारक हो ,भला उससे कौन नहीं डरेगा ! उनसे तो डरते- डरते भी नमस्ते ही निकलता है।यों तो राह चलते ,उठते -बैठते,आते- जाते :नमस्ते एक सार्वजनीन शब्द है,किंतु परिस्थिति विशेष में उसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

प्रत्येक भाषा और देश में 'नमस्ते' के अलग -अलग रूप हो सकते हैं। किंतु उनका कार्य एक ही है।कभी आगमन का स्वागत तो कभी विदाई का अनागत ;सब जगह यह  नमस्ते ही बहुउद्देशीय एक शब्द।परिचय या संवाद ;सबका श्रीगणेश 'नमस्ते' से। 'नमः' में विनम्रता का एक ऐसा सद्भाव है,जो हृदय को द्रवित करता है। नमस्ते न करना भी अखरता है।किसी की नमस्ते का उत्तर नमस्ते से न देना ,जाने क्या- क्या व्यक्त कर जाता है। नमस्ते का प्रत्युत्तर न देना वाचक के प्रति उपेक्षा और अपमान के भाव को भी व्यक्त करता है। और साथ ही जवाब न देने वाले के अहंकारी चरित्र का दर्पण भी बन जाता है। वह उपेक्षा करने वाले के चेहरे को दिखा देता है।कुछ लोग इतने धीमे से नमस्ते का उच्चारण करते हैं,कि

प्रापक के पास  पहुँच ही नहीं पाता। कुछ लोगों के हाथ के संकेत, करबद्धता या मस्तक पर नमन का भाव भी प्रकारांतर से 'नमस्ते'  ही है। इस प्रकार नमस्ते के विविध रूप हो सकते हैं, शैलियाँ हो सकती हैं। तरह -तरह के लोगों से संपर्क और व्यवहार यह सब कुछ सिखा देता है। व्यक्ति की मुख -मुद्रा भी नमस्ते की संगिनी है, यदि होठों पर मुस्कान नहीं आई ,तो वहाँ औपचारिकता भर हो सकती है। हाथ जोड़ते हुए सिर झुका लेना भी नमस्ते के अंग और उपांग हैं। व्यक्ति के  सामाजिक व्यवहार में पारंगत होने पर सब आ जाते हैं।

इस प्रकार नमस्ते एक मानवीय संस्कार है। कुछ ऐसे भी 'महापुरुष' हैं ,जिन्हें किसी को नमस्ते करने में ही अपनी तौहीन महसूस होती है। उन्हें लगता है कि यदि उन्होंने किसी को नमस्ते कर ली ,तो उनकी पगड़ी ही उतर गई। इसलिए वे तने रहते हैं,सूखे पेड़ की तरह। कहीं कोई नम्यता नहीं, कोई द्रव्यता नहीं, बस तन्यता ही तन्यता।इसे हम उनकी वन्यता भी कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। परंतु वे मानवीय उदात्त  मनोभावों  की धन्यता से वंचित तो हो ही जाते हैं।

आइए !देखिए !! पहचानिए!!!वर्ष 2025 हम सबको नमस्ते कर रहा है। हम भी उसे सद्भावपूर्वक विदाई की नमस्ते करें और उसके उपकारों के प्रति कृतज्ञता का भाव दर्शाएँ।उधर वर्ष 2026 के शुभागमन का स्वागत करें,उसे करबद्ध नमस्ते करें और परम पिता परमात्मा से प्रार्थना करें कि देश, दुनिया, समाज और परिवार पर उनकी महती कृपा की बरसात होती रहे।

सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःखभाक् भवेत्।

शुभस्तु !

27.12.2025 ●1.15प०मा०

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