बुधवार, 10 दिसंबर 2025

आशा का आँचल [ व्यंग्य ]

 726/2025

 

 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 दुनिया में कुछ चीजें बनाई ही इसलिए गई हैं कि उन्हें पकड़ा ही जाए ,बल्कि उन्हें पकड़े रखा जाए और जब तक हमें हमारा प्राप्तव्य प्राप्त न हो जाए तब तक उसे पकड़े रखा जाए अर्थात उन्हें छोड़ा ही न जाए। ऐसी ही चीजों में एक चीज है 'आशा का आँचल ' ; जो पकड़े रखने वाली अभौतिक चीज है। जब पकड़िए तो छोड़िए मत ,जब तक हमारा इच्छित कार्य पूरा न हो जाए। अब आशा कोई ऐसी चीज तो नहीं है ,जो दिखलाई दे अथवा जिसे छुआ जा सके या जिससे बात की जा सके। वह दिखाई भी नहीं देती और पकड़नी भी होती है। है न आश्चर्य की बात कि जो दिखाई भी न दे और अंत तक पकड़े भी रहना है।सभी विचारवान ,बुद्धिमान, महामानवों का तो यही कहना है कि आशा का आँचल मत छोड़ देना । आशा का आँचल छोड़ा कि वह फिर हाथ नहीं आएगी,जिसके लिए आशा का आँचल पकड़ा था। जब एक बार उसे पकड़ ही लिया है तो पकड़े रहिए।जब तक हमारी ईरू गाय दूध न देने लगे और उसका हल्का पीला और मधुर दुग्ध हमें पीने को न मिलने लगे तब तक ही नहीं उसके बाद भी उसका चारा पानी,सेवा टहल, गोबर मूत्र की सफाई,बीमार पड़े तो दवाई, उसके बाद ही हो सकेगी दूध,दही,छाछ और घृत की पिलाई। यह आशा ही है जो सब कुछ करवाती है, घास खोदने से लेकर उसके गोबर का निस्तारण और ज्यादा इकट्ठा हो जाए तो उसका विस्तारण :सभी कुछ करना जरूरी है। इधर तो वह गो माता है ,फिर उसकी सेवा के नाम पर क्यों चिचियाता है ,जब गाय के चार थनों से आशा बाँधी है, तो ये खीझ की क्यों चला रखी आँधी है, आशा का पल्लू छोड़ मत देना। वैसे यह गलत है कि आशा का पल्लू तो बेटा और बेटी पकड़े बैठे हैं और गौ सेवा केवल माँ और बाप के पल्लू से बँधी है। जब गाय दूध देने लगेगी तब तो सबसे पहले बड़ा सा कटोरा लेकर बैठ जाओगे कि पहले मैं लूँगा या मैं ही लूँगी। कोई कहेगा कि मैं घर में बड़ा हूँ,इसलिए पहला अधिकार मेरा है और एक कहेगी कि सबसे छोटी होने के कारण पहले मैं ही लूँगी।

 ये आशा थी तो एक ,अब उसके बाँट खाने वाले इतने आ गए।वाह री आशा और वाह रे तेरा लंबा ममता भरा आँचल कि पूरे परिवार को बाँट दिया ! वस्तुतः आशा होती ही ऐसी है। जब वह फलती है,तो निराशा को अपने पैरों तले यों मसलती है ,जैसे गाय ने अपने पैरों तले कोई मच्छर मसल दिया हो।

 इस मानव संसार में आशा का वृहद विस्तार है। किसी की आशा कहीं है और किसी की कहीं और है। माँ बाप को अपनी संतान से आशा है कि वह जब होगी तो बुढ़ापे की लकड़ी का सहारा बनेगी।एक बटुआ-सी बहू आएगी जो उसे बिस्तर पर बैठे- बैठे खिलाएगी,उनकी सेवा टहल करेगी । किन्तु कष्ट तो जब होता है जब आशा का आँचल धोखा देता है और बेटा और बहू उसे सेवा के नाम पर वृद्ध आश्रम में छोड़ आते हैं और अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। आशा के ऐसे कुपरिणाम एक नहीं ,हजारों हैं।किसी को नौकरी से आशा, किसी को नौकरों से आशा,किसी को वेतन से अधिक रिश्वत से आशा,किसी को नम्बर एक छोड़कर नम्बर दो से आशा और इस देश को नेताओं से आशा।पर क्या वह मिलेगी ? शायद वहाँ उन्हें आजीवन उस नेताशा का आँचल छोड़ना ही होगा,क्योंकि नेता के पास ऐसा कोई आँचल होता ही नहीं ,जिसे कोई पकड़े या पकड़े रखे।उसे खुद अपना ही पता नहीं कि सवेरे वह किस झंडे के नीचे खड़ा होकर जन गण मन अधिनायक जय हे ! गाएगा। 

 आशा एक माँ की तरह है। जिसने भी उसका आँचल छोड़ा, वही गया काम से।देखेगा वह अगला रास्ता आराम से।गलत जगह पर गलत चीज की आशा पतनोन्मुख ही करती है।गलत टाइप की आशाओं से सब दिग्भ्रमित ही हो रहे हैं।यह अलग बात है कि आशा उन्हें भी निराश नहीं कर रही है, किन्तु उनकी भावी दिशा और दशा अंधकारमय है। क्या मतदाता इन नेताओं और दलों को इसीलिए वोट देता है कि ये कल अपनी जेबें नहीं सोने और नोटों के बोरों से अपने कोठे भरेंगे और वोटर को आश्वासन की चटनी चटाकर चकरघिन्नी बनाएँगे ? वोटर की आशा निष्फल ही जा रही है। इसलिए युवाओं को अपने बुद्धिबल की आशा का दामन थामना चाहिए ,इन नेताओं का पिछलग्गू बनकर तो बरबाद ही होना होगा। पकड़े रहो तो आशा अवश्य फलवती होती है। किंतु ध्यान रहे कि वह दुराशा न हो। 

 आशा की पहचान बहुत जरूरी है। किस आशा का आँचल थामने योग्य है और किसका नहीं ,यह विवेक प्रत्येक जन में होना ही चाहिए। दुराशा सदा दुखदायिनी ही होती है। चोर से मोर मरवाओगे तो क्या मिलना है,चोर तो चोरी ही करेगा। चोरी ही कराएगा,चोरी को ही प्रश्रय देगा। चौर्य कर्म का आशातीत विकास करेगा। यही सब कुछ तो इस देश में हो रहा है।दुराशाओं के दामन जकड़े जा रहे हैं और सदाशायें छोड़ी जा रही हैं।आज का युवा बिना परिश्रम रातों रात करोड़पति बनने के ख्वाव देख रहा है। परिणाम में उसे निराशा ही मिल रही है। इससे देश समाज व्यक्ति और परिवारों का भविष्य कैसा है,पहले से ही दिखाई दे रहा है क्योंकि पूत के पाँव पालने से बाहर फड़क रहे हैं।

 शुभमस्तु !

 10.12.2025●8.00आ०मा०

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