सोमवार, 22 दिसंबर 2025

तुम जाड़े की धूप सरिस [ नवगीत ]

 769/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तुम जाड़े की

धूप सरिस

तन-मन गरमाती हो।


गमन तुम्हारा

नव तुषार-सा

शीतल करता देह

लगता

सन्नाटा पसरा हो

बिना तुम्हारे गेह

गरम चाय की

प्याली-सी 

अधरों को भाती हो।


पायल चूड़ी

रुनझुन खनखन

की मध्यम-सी गूँज

व्यापित है

कोने- कोने में

कोकिल जैसी कूँज

कभी-कभी

अपनी बातों में

उलझा जाती हो।


दो पल को भी

विलग हुई तो

मन घबराता है

किसी और को

कैसे पूछूँ

अति शरमाता है

घर भर की

चिंता है तुमको

नित चमकाती हो।


शुभमस्तु !


22.12.2025● 2.15 प०मा०

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