751/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
प्रेरणा की ज्योति ने
सोते हुए से
जब जगाया
संचार हुआ
नव चेतना का।
न कहीं तम रहा
न कोई भ्रम रहा
समय का भी सम रहा
पर सब कुछ हुआ है
अनकहा।
सोकर उठा जो आदमी
संचेतना है लाज़मी
कल जो हुई थी ,आज भी
देती हुई नव ताजगी।
जीवनदायिनी है प्रेरणा
मिटती हुई हर वेदना
सुनते श्रवण अनुनाद-सा
ज्यों वेद का अनुवाद-सा।
यह प्रेरणा निर्मूल्य है
मिलती किरण अतुल्य है
होना ही हमें कृतज्ञ है
यह मनुज का कर्तव्य है
जीवन तभी तो भव्य है।
शुभमस्तु !
18.12.2025●7.30 प०मा०
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