787/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
पहले माला थी
फूल थे पुष्पगुच्छ थे
साथ में शॉल या दुशाला
अब आ गया है पटका
सम्मान को कहाँ से
कहाँ ला पटका !
आगे पटका को भी
लगने वाला है झटका
अब तक बहुत
कुछ ज्यादा ही मटका।
ये पटका भी
कब सटक जाए
कुछ पता नहीं,
मुझे पता है
इसका भविष्य,
अब गले में
ओढ़ाया जाएगा
लाल पीला
रँगा कलावा,
जो गोले में से
एक दर्जन गलों की
शोभा बढ़ाएगा,
पटका को झटका
लगाएगा।
आवश्यकता
आविष्कार की जननी है
कवियों के सम्मान पर
रार ठननी ही ठननी है,
सम्मान का नया अवतार
कलावा होगा,
उसके बाद कुछ
नया आविष्कार भी होगा।
जमाना बदल रहा है
सब कुछ बदल रहा है
आदमी रँग बदल रहा है
शॉल माला से आगे
बढ़ी है यात्रा अभी
पटका की पताका बनी है,
अब कलावे की बारी है,
आगे- आगे देखते जाइए
क्या- क्या तैयारी है !
शुभमस्तु !
26.12.2025 ● 7.45प०मा०
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