742/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
वासना के
खेल में बरबाद
जीवन की कहानी।
माता-पिता का
पालना पोषण
सभी को भूल जाना
देह सुख के
लोभ लालच में
किसी में फूल जाना
नष्ट कर
मर्यादता
पल में डुबानी।
नाक भी
अपनी न थी
कैसा बचाना
इश्क के दर स्वांग
शादी का रचाना
बाप की
थोड़ी बची
वह भी कटानी।
वासना से
प्रेम होता
भिन्न कितना
एक बकरी
ऊँट से है
खिन्न जितना
शेष क्या अब
मूढ़ अन्धो
नव जवानी।
शुभमस्तु !
17.12.2025●11.45 आ०मा०
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