763/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
गली-गली में मिलते ज्ञानी।
किंतु ज्ञान के अति अभिमानी।।
कथनी में बल जिनके भारी।
करते नहीं यही बीमारी।।
नहीं ज्ञान की कुछ कोताही।
चलें उलट पथ जिनके राही।।
ज्ञानी का नित रौब दिखाएँ।
बात पलट वे पल में जाएँ।।
बने विदुर नित नीति जताएँ।
कहते किंतु न धर्म निभाएँ।।
ज्ञानी जन ले ग्रीवा पट्टा।
खेल रहे मेले में सट्टा।।
राम कृष्ण थे बढ़-चढ़ ज्ञानी।
महिमा जिनकी जगत समानी।।
सन्त विवेकानंद अनोखे।
खुले ज्ञान के अनुपम मोखे।।
बिना ज्ञान धरती पर सूखा।
अन्न शोध बिन जन-जन भूखा।।
किस ज्ञानी ने अन्न उगाया।
क्षुधा-शमन का पंथ सुझाया।।
ज्ञानी जामवंत थे भालू।
सोच लिया कुछ राह निकालूँ।।
जो हनुमान सिंधु तर जाएँ।
लंका पहुँच सिया सुधि लाएँ।।
गुरु होते हैं सब ही ज्ञानी।
जिनकी बात शिष्य ने मानी।।
गुरु का ज्ञान सदा सुख दाता।
'शुभम्' शिष्य नित मोद मनाता।।
शुभमस्तु !
21.12.2025● 7.15प०मा०
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