772/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सबको अलग ही
रास्तों पर
ले जा रही है जिंदगी।
हाथ में
अपने नहीं कुछ
भेजा गया करना वही
चाहता
निर्धन बने क्यों
दूध या मिलना दही
रजत चम्मच
ले के आया
सबला रही है जिंदगी।
नियति का
नटवर नचाता
बंदर- बंदरिया सा तुझे
दौड़ता
संकेत पर तू
कहता नहीं करना मुझे
कब मोड़ दे
तेरी दिशा को
बतला रही है जिंदगी।
कठपुतलियों के
खेल का
तू पात्र ही है आदमी
नाचना
ही नाचना
तक़दीर में जो लाज़मी
श्वास का
कर खेल पूरा
समझा रही है जिंदगी।
शुभमस्तु !
23.12.2025● 12.00मध्याह्न
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