सोमवार, 22 दिसंबर 2025

ये बुफ़े की दावतें! [ नवगीत ]

 754/2025




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ये बुफे की

दावतें हैं

 या की अदावत।


भैंस गायों की 

तरह

नादें  भरी हैं

देखते ही

आँख होतीं

सब हरी हैं

आदमी के ही 

लिए या

बैल गायों की हैं बावत।


हो खड़े होकर

हो खाना

या न खाओ

पूछता कोई नहीं

भले

भूखे  विदा हो

कोई हाथी

अश्व हो

या हो महावत।


वक्त कम है

आदमी

जो बैठ जाए

चैन से

ले पालथी

भर पेट खाए

आ गई है

आज तो

 कैसी ये शामत!


दावतों का

दौर है

जिस ओर जाएँ

अच्छे भले हों

वस्त्र

जा भरपेट खाएँ

अनामंत्रित

हो भले

उसको भगा मत।


शुभमस्तु !


20.12.2025●11.15आ०मा०

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