792/2025
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डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
रात के सघन अंधकार में रेलगाड़ी अपनी तीव्र गति से दौड़ी चली जा रही थी।मेरे पास के अधिकांश यात्री सो रहे थे। रात के दो बजे के बाद का समय रहा होगा। पर शुभम् के कवि मन को चैन कहाँ ?मैं सो नहीं रहा था।मेरे चेतन और अवचेतन मन दोनों ही जाग रहे थे।उस ट्रेन के उस डिब्बे में कोई बत्ती भी नहीं जल रही थी। जितना गहरा अँधेरा मेरे चारों ओर था,उतना ही उजाला मेरे अंदर से प्रस्फुटित हो रहा था।उस समय मेरे पास लिखने के लिए न प्रकाश था और न अन्य साधन ही।तभी मुझे ध्यान आया कि मेरी शर्ट की जेब में एक पैन और बैग की जेब में एक छोटी सी डायरी है,जिसे मैं यात्रा के समय सदा अपने साथ रखता हूँ।उस अँधेरे में विचारों और भावों का प्रवाह भी ट्रेन की रफ़्तार से कम तेज नहीं दौड़ रहा था। मेरे मन में कविता लिखने की सूझी।
यह बात उस समय की है ,जब मैं वर्ष 2006 में चौधरी चरण सिंह राजकीय महाविद्यालय छपरौली (बागपत)में हिंदी विषय का प्रोफ़ेसर था। कई बार बीच- बीच में घर परिवार की कुशलता के हाल चाल जानने के लिए ट्रेन से शिकोहाबाद से मेरठ की यात्रा करता था। यह यात्रा रात में ही होती थी,क्योंकि संगम एक्सप्रेस रात्रि में अपनी यात्रा करते हुए सुबह सात बजे मेरठ पहुँचाती थी।
मेरे मन में एक नया विषय उत्पन्न हुआ और उस घने अंधकार में ही डायरी के पृष्ठों पर लेखनी चलने लगी। रचना का विषय था : 'अंधकार'। रात के उस अंधकार में ,जिसमें हाथ को हाथ भी नहीं सूझ रहा था,एक कवि कविता कर रहा था। अनुमान मात्र से ही अक्षर शब्द और भाव डायरी के छोटे छोटे पृष्ठों पर साकार होते जा रहे थे। इधर गाड़ी के झटके और भावों के लटके एक नया वातावरण सृजित कर रहे थे।टेढ़े मेढ़े अक्षरों में कविता का लेखन चल रहा था।कभी अक्षर के ऊपर अक्षर लिख जाते और कभी उनमें अंतराल भी हो जाता। पर दिन के उजाले में रचना पढ़ी और समझी जा सकती थी। अँधेरे में अँधेरे पर ही कविता लिखना एक नवीन प्रयोग था,मौलिक उद्भावना थी।जिसमें छिपी हुई कुछ संभावना थी।वातावरण में परम शांति थी। कहीं कोई नहीं भ्रांति थी।गाड़ी झकोरे ले रही थी,और नई कविता भी नए रंग उकेर रही थी। कैसा ही अद्भुत समा था!,कवि अपने लेखन कर्म में रमा था। एक आध घण्टे तक बराबर लिखता रहा और मन के उजले भावों को काले अँधेरे के पन्नों पर उकेरता रहा।
अंधकार पर कविता करते हुए कितना समय निकल गया,कुछ भी पता न लगा।रचना पूर्ण हुई और डायरी और पैंन जेबगत हुए।गाड़ी आगे बढ़ती जा रही थी। अभी सुबह होने में देर थी। पर मन के किसी कोने में बड़ी संतुष्टि थी। अपने ही लेखन पर रीझे जाने की पुष्टि थी। मानो रस वर्षा की वृष्टि थी। भाग चुकी तन-मन की सुस्ती थी। यात्री सो रहे थे और कवि के भाव उसे भिगो रहे थे।
छपरौली वाले कमरे पर पहुँच कर निराकार के साकार ने फाइनल डायरी में यथासमय आकार लिया। अपनी रचना के लिए अंधकार का आधार लिया,इसलिए उसके लिए पुनः पुनः आभार किया। जिन क्षणों में काव्य शब्दों ने अवतार लिया, कवि ने पुनः- पुनः वाचन किया , एक उपहार लिया। आज भी जब उन सुमधुर पलों की याद आती है, अंधकार में भी भावों की बिजली कौंध - कौंध जाती है। पढ़ने वाला भी कहेगा कि ऐसा भी कभी होता है, कि कोई कवि अंधकार में सृजन के बीज बोता है। भावों और विचारों के आगमन का कोई निर्धारित क्षण नहीं होता है, कवि का मन सम्भवतः कभी नहीं सोता है।वह एक छोटे-से क्षण को भी महान बनाता है।शब्दाक्षरों से अपनी वीणा के साज सजाता है। यही तो सब माता सरस्वती का शुभ आशीष है। विघ्न विनाशक गणेश भगवान का संदेश है।
शुभमस्तु !
29.12.2025●10.30 आ०मा०
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