761/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
रास्ते
सीधे कभी
होते नहीं हैं।
आज तक
जितना चला
सीधा न कोई
कंकड़ों -
पत्थर भरे
इकसार कोई
मोड़ भी
जितने पड़े
सीधे नहीं हैं।
राह में
अपनी बनानी
राह पड़ती
अवरोधकों
के बिना
गाड़ी न बढ़ती
हार के बिन
हम कभी
जीते नहीं हैं।
ये न समझो
ली छलाँगें
और आए
चढ़ लिए
सोपान तब
यह शृंग पाए
उलझनों के
दिन कभी
बीते नहीं हैं।
शुभमस्तु !
21.12.2025●1.45प०मा०
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