778/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
केंद्र, साधना का
साधक की
एकबिन्दुता।
बिंदु मात्र विस्तार
सिंधु की
अगम गहनता
अणु हो
परम सुसूक्ष्म
बिंदु की अटल सफलता
उतरो
उतरो और वही है
एकसिंधुता।
मछली
केवल एक
ताल को गदला करती
कवि की
केवल पंक्ति
नई परिभाषा गढ़ती
चिंतक
मुक्ता खोज
सीप में दे सुंदरता।
मन की टोह
गगन से ऊँची
माप नहीं है
रवि मंडल से
ऊपर जा
कुछ और कहीं है !
बनी रहे बस
मन की केवल
तारतम्यता।
शुभमस्तु !
24.12.2025●2.15प० मा०
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