780/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
दे नहीं सकते
किसी को
अन्य से उम्मीद क्यों हो!
भानु शशि धरती
नदी सब
दे रहे हैं,ले रहे तुम
नीर पावक
सिंधु अंबर
क्या न देते,जी रहे तुम
स्वार्थ से
ऊपर उठो तो
पर्जन्य से उम्मीद क्यों हो!
काष्ठ ईंधन
फूल फल सब
जंगलों ने दे दिए हैं
काटते हो
रात -दिन तुम
नाश का प्याला पिए हो
मेघ भी
देंगे न पानी
वन्य से उम्मीद क्यों हो !
इस हाथ दे
उस हाथ लेना
है नियम ऐसा सदा से
भूमि में
जब बीज बोते
फूटते अंकुर वहाँ से
जब क्षमा
करने न आए
क्षम्य से उम्मीद क्यों हो !
शुभमस्तु !
24.12.2025 ●3.45 प०मा०
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