बुधवार, 24 दिसंबर 2025

अन्य से उम्मीद क्यों हो! [ नवगीत ]

 780/2025


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दे नहीं सकते

किसी को

अन्य से उम्मीद क्यों हो!


भानु शशि धरती

 नदी सब

दे रहे हैं,ले रहे तुम

नीर पावक

सिंधु अंबर

क्या न देते,जी रहे तुम

स्वार्थ से

ऊपर उठो तो

पर्जन्य से उम्मीद क्यों हो!


काष्ठ ईंधन

फूल फल सब

जंगलों ने दे दिए हैं

काटते हो

रात -दिन तुम

नाश का प्याला पिए हो

मेघ भी 

देंगे न पानी

वन्य से उम्मीद क्यों हो !


इस हाथ दे

उस हाथ लेना

है नियम ऐसा सदा से

भूमि में 

जब बीज बोते

फूटते अंकुर वहाँ से

जब क्षमा

करने न आए

क्षम्य से उम्मीद क्यों हो !


शुभमस्तु !


24.12.2025 ●3.45 प०मा०

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