752/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
देता है जो प्रेरणा, सदा हितैषी एक।
अंधकार में जो रहे, देता उसे विवेक।।
देता उसे विवेक, राह सत की दिखलाए।
चले कुपथ जो व्यक्ति, उसे सन्मति दे जाए।।
'शुभम्' उसे सम्मान, सदा ही करे प्रणेता।
वही मित्र है इष्ट , प्रेरणा सत की देता।।
-2-
अपने गुरु की प्रेरणा, हितकारी है मित्र।
बिना लोभ लालच करे,सिख का श्वेत चरित्र।।
सिख का श्वेत चरित्र, राह का दीपक प्यारा।
गुरु ही होता एक, जगत में सबसे न्यारा।।
'शुभम्' शिष्य के हेतु,देखता मनहर सपने।
नहीं अहितकर केतु, कभी गुरु होते अपने।।
-3-
सबके हितकारी सदा, मात-पिता संमित्र।
देते हैं शुभ प्रेरणा, ज्यों प्रसरित हो इत्र।।
ज्यों प्रसरित हो इत्र, दूर तक मह- मह न्यारा।
अमर दिव्य वह चित्र, अन्य कोई क्या प्यारा।।
'शुभम्' न बदलें रूप, अटल हैं अपनी छवि के।
आजीवन प्रभु मान, पिता-माता जो सबके।।
-4-
होता जिसमें ज्योति का,उज्ज्वल दिव्य प्रकाश।
भानु सदृश देता वही, प्रेरक बना सुआश।।
प्रेरक बना सुआश,प्रेरणा जब रँग लाती।
होता वहीं उजास, कली उर की मुस्काती।।
'शुभम्' न देता ध्यान, वही आजीवन रोता।
मिले जगत में मान, लौह से कंचन होता।।
-5-
करना सागर पार था, जामवंत के बोल।
बनकर हनुमत प्रेरणा, बने अमिय रस घोल।।
बने अमिय रस घोल,शीघ्र जा पहुँचे लंका।
पकड़ी गति अनतोल, बजाया ऐसा डंका।।
'शुभम्' राम का साथ, नहीं क्यों किससे डरना।
चले झुका निज माथ, पार सागर था करना।।
शुभमस्तु !
18.12.2025● 8.45प०मा०
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