सोमवार, 22 दिसंबर 2025

कलयुग में उम्मीद! [ नवगीत ]

 768/2025



           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कलयुग में

उम्मीद 

भरत लछमन की कैसी !


भूल गए

त्रेता में

जीवन मूल्य अलग थे !

राम लखन

शत्रुघ्न भरत

के प्राण सुभग थे

जिस दिन

चूल्हे चार जले

फिर समता कैसी!


अपना 

तेरा मेरा दिखता

आज सभी को

नहीं देखता

एक बंधु

दृग जमी नमी को

सबका

उसको मिले भाग

 फिर द्रवता कैसी !


भाग्य एक का

नहीं एक को

कभी सुहाता

सोच रहा है

निंद्य

काश भाई मर जाता

साढू से

है प्रीति

भ्रात से रमता कैसी!


शुभमस्तु !


22.12.2025● 1.30प०मा०

                   ●●●

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...