सोमवार, 22 दिसंबर 2025

पूस-माघ में रूप बदलती [ नवगीत ]

 767/2025



    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पूस - माघ में

रूप बदलती

कैसे-कैसे धूप।


चैत्र जेठ

वैशाख मास में

अलग धूप के तेवर

सावन भादों में

मँडराते

जब मेघों के घेवर

कई -कई दिन

तरसा जाती

वह बरसाती धूप।


फागुन में

जब होली खेली

धूप बरसती ऐसे

पिचकारी के

रंग फुहारें

छोड़ रहे हों जैसे

तन-मन को

अति नित्य लुभाती

वासंती  नव  धूप।


शरद शिशिर

हेमंत काल में

तरस-तरस हम जाते

पूस माघ में

बैठ खुले में 

इंतजार  कर पाते

थर -थर काँपे

ढोर मनुज खग

शीत काल की धूप।


शुभमस्तु !


22.12.2025●12.15प०मा०

                 ●●●

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...