767/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
पूस - माघ में
रूप बदलती
कैसे-कैसे धूप।
चैत्र जेठ
वैशाख मास में
अलग धूप के तेवर
सावन भादों में
मँडराते
जब मेघों के घेवर
कई -कई दिन
तरसा जाती
वह बरसाती धूप।
फागुन में
जब होली खेली
धूप बरसती ऐसे
पिचकारी के
रंग फुहारें
छोड़ रहे हों जैसे
तन-मन को
अति नित्य लुभाती
वासंती नव धूप।
शरद शिशिर
हेमंत काल में
तरस-तरस हम जाते
पूस माघ में
बैठ खुले में
इंतजार कर पाते
थर -थर काँपे
ढोर मनुज खग
शीत काल की धूप।
शुभमस्तु !
22.12.2025●12.15प०मा०
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