776/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
शॉल
बुनने में लगी है
उषा गुडहल-सा खिला।
देर से
सोकर उठा है
पूस का सूरज सजल
पढ़ रही
पूरब दिशा अब
प्यार की कल की ग़ज़ल
दो कदम
दिखता न पथ में
खो गया कैसे किला।
कोहरे की
ओढ़ चादर
भोर आया सामने
मुँह ढँका
ओढ़ी रजाई
पैर लगते तानने
चल रहा है
शीत लहरी का
हहरता सिलसिला।
सृजन गर्मी का
किसी विधि
हो यही बस कामना
चाय की
चुस्की भपीली
आग का हो तापना
झाँकता
सूरज उजेला
मध्याह्न का ये चिलचिला।
शुभमस्तु !
24.12.2025●1.00प०मा०
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