786/2025
© व्यंग्यकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
आप एक आम आदमी हैं,आम स्त्री हैं।इनमें न तो कोई नेता है,न उनका गुर्गा या चमचा है और न राजनीति से कोई संबंध रखता है। वह एक विशुद्ध आदमी या स्त्री है।राजनीति या राजनेता या उसके पिछलग्गू की हवा आपको दूर-दूर तक छू भी नहीं गई। ऐसे ही एक हजार जन एक बड़े से हॉल में एकत्रित हैं। आप भी उस जनसमूह में विद्यमान हैं। आप और उन सबसे एक प्रश्न पूछा गया कि 'इस पूरे देश की जनतांत्रिक व्यवस्था को सँभालने के लिए क्या सब कुछ इन नेताओं पर छोड़ देना उचित है?'
देश के समस्त राजनेताओं के चाल और चरित्र का हाल सबको पता है। जो किसी से छिपा नहीं है।वे जो कुछ कर रहे हैं उनमें से मात्र दशलव एक प्रतिशत को छोड़कर ऐसे कितने राजनेता हैं, जो देशभक्त हैं,राष्ट्रभक्त हैं? देश को समर्पित हैं ? क्या उनके कारनामों से जन हित हो सकता है ?क्या इनके हाथों में देश का भविष्य सुरक्षित है? इस सम्बंध में आपको दिए प्रश्न के उत्तर में क्या कहेंगे? बिना किसी भय और लाग लपेट के आप क्या इस व्यवस्था का समर्थन करेंगे अथवा व्यवस्था को बदले जाने के विकल्प पर चिंतन करने का सुझाव देंगे ?
इसके उत्तर में कुछ लोग तो यही कहेंगे कि जैसे चल रहा है ,ठीक ही है, हम भला क्या कर सकते हैं। जब सब कुछ वोट से ही तय होना है तो जैसे नागनाथ वैसे ही साँपनाथ। क्या फर्क पड़ता है?हम क्या करें ?जैसा है ,वैसा झेल रहे हैं,भले ही वे आम जन को पेल रहे हैं।आम आदमी के जज्बातों से खेल रहे हैं। जो प्रबुद्ध वर्ग होगा वह इस बात पर जोर देगा कि व्यवस्था को बदले जाना चाहिए ,और इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कुछ 'खास' के हाथों हर आम का शोषण नहीं होना चाहिए।एक कंगाल विधायक मंत्री बनते ही करोड़ों में खेलता है।वह जितनी बार विधायक या मंत्री बनता है,उतनी पेंशन लेता है। हर बार की अलग अलग लेता है और दूसरी ओर एक कर्मचारी या अधिकारी 30 वर्षों तक देश की सेवा करता है, उसकी पेंशन खत्म कराने के लिए हाथ खड़े करता है। कुल मिलाकर इस व्यवस्था के सम्बंध में यदि गुप्त मतदान किया जाए तो शायद एक भी वोट इस व्यवस्था के समर्थन के सम्बन्ध में नहीं पड़ेगा। जब जनमत ही इसके विरुद्ध है,तो व्यवस्था पर विचार क्यों नहीं किया जाता ! अब विचार की बात आती है तो कौन विचार करे ? वह सब भी इन्हीं राजनेताओं के जिम्मे! भला ऐसा कौन होगा जो अपनी जड़ें काटने के लिए विचार करेगा ! अपना अन्धानुशासन चलता रहे और अंधेर नगरी का जलवा कायम रहे। कोई नई व्यवस्था क्यों आए ? चोर से मोर मरवाने का काम जैसा हो सकता है, वही है वर्तमान प्रजातंत्र ,जहाँ निरक्षरों ,अनपढ़ों, पढ़े लिखे अज्ञानियों के वोटों द्वारा लोकतन्त्र का मंत्र पढा जाता है।और 'आ बैल मुझे मार' की कहावत को अपने ऊपर लागू किया जाता है। इनका विश्वास है कि रिश्वत दो और उनका है कि रिश्वत लो और सबका विश्वास है कि पकड़े जाओ तो रिश्वत देकर छूट जाओ।यही लोकतंत्र है।देने वाला खुश तो लेने वाला महाखुश।
अब इस विचार के दूसरे पहलू पर विचार करते हैं। यदि देश के सर्वदलीय राजनेताओं से यही बात रखी जाए तो व्यवस्था के समर्थन में यदि एक हजार में आठ सौ वोटर नेता उपस्थित हों तो भी मत गणना के बात मत परिणाम एक हजार एक सौ से ऊपर ही रहेगा। इनमें अनुपस्थित दो सौ और एक सौ अतिरिक्त वोट पड़ जाएँगे। यही इस लोकतंत्र में हो रहा है। कितना ईमानदार है इस देश का कर्णधार ! दम्भ दारु बेड़ा पार! पीछे खड़ा हुआ बोलेगा मेरा कटोरा तेरे से भी अगार(आगे)।
यहाँ जो चल रहा है;वह सब ठीक ही है। कहीं कोई आपत्ति नहीं ,कोई विरोध नहीं।चुसने वाला धैर्य के साथ चुस रहा है और चूसने वाले को चूसना ही है ;वह निरंतर चूसे जा रहा है।यह भी लोकतंत्र का एक अहम पहलू है। यहाँ कुछ भी हो,कोई विरोध नहीं, कोई हलचल नहीं,सब स्वीकार,सब हज़म।थोड़े से दिन टीवी अखबारों और सोशल मीडिया पर पत्ते खड़के,बाद में वह भी शांत।यहाँ गलत और सही सबका साधारणीकरण हो गया है।यह भी इस लोकतंत्र का एक अहम बिंदु है। सबको कुर्सी चाहिए,अब चाहे वह नेता हो या कर्मचारी या अधिकारी।नर अथवा नारी ,एक से एक अगाड़ी। चरित्र गया तेल लेने। इसकी किसी को कोई चिंता नहीं, चरित्र का प्रमाणपत्र भी उन लेखनियों से जिनका अपना कोई चरित्र नहीं।वही मान्य है,सर्वमान्य है। सब जगह बाईस पंसेरी धान हैं। पूरे देश पर तना हुआ एक ही वितान है। सब जनगण उसी के नीचे का मेहमान हैं।जो दे नहीं सकते ,उनसे टेक्स लिया जाता है और राजनेताओं को यों ही आगे बढ़ने दिया जाता है। वे टेक्स फ्री,टॉल फ्री, पानी फ्री, यात्रा फ्री, मोबाइल फ्री, बंगला फ्री, समस्त सुविधाएँ फ्री। अगर किरकिरी है तो बस आम आदमी की ही।जो वर्दी में आ गया ,वह सुविधा लाभ वर्दी से पा गया। अंततः नेता सबके ऊपर तंबू बना छा गया।
देश की इस व्यवस्था के प्रति किसी के कान पर कोई जूं भी नहीं रेंगती।सब कुछ सर्व स्वीकृत है। अंगीकृत है। तमस से आवृत है। राजनीति को घृत ही घृत है।जो जितना उनके सम्पर्क में है,उतना ही प्रसन्न। भले ही निर्धन को मयस्सर न हो दो वक्त का अन्न । नेताजी टनाटन और आम जन में दनादन। किसने कहा नेता आदमी या औरत नहीं होता।वह बस नेता होता है, थर्ड जेंडर से भी आगे फोर्थ जेंडर।आम आदमी तो दीवाल पर टंगा हुआ कैलेंडर, जिसे वहीं टंगे-टंगे नेता को बदलना है।पाँच साल में देश की चाल को बदलना है। मत का विलोम -अनुलोम चल रहा है।आम आदमी समझता है सरकार उसकी है और नेता पुत्र कहता है कि उसकी है; निर्णय आपको करना है।आप निर्णय क्या करोगे ,आपने तो यह अधिकार वोट के बदले उन्हीं को बेच दिया है। आप तो खाली लिफ़ाफे हो, कोई कुछ भी भर ले।
शुभमस्तु !
26.12.2025●4.00 प०मा०
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