775/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
चाहते हो गाँव को
यों शहर में
झटपट बदलना।
बाप हैं यदि गाँव
तो बेटे हुए
बिगड़ैल भारी
चमक ही
इनको लुभाती
और भी इनको बिमारी
इधर खाते
उधर पीते
फिर पड़े इनको पलटना।
पेड़ बेलें
नदी पर्वत
खेत भी मिटने लगे हैं
कंकरीटी
भवन ऊँचे
गाँव में बनने लगे हैं
नीम की
छतनार छाँहें
है न छप्पर का टपकना।
गाँव गलियों में
न ऊँची
बाँग मुर्गे की जगाती
गाड़ियों के
हॉर्न बजते
ओस मुड़गेरी भिजाती
कोहरे की
शॉल ओढ़े
देखा नहीं पाला बरसना।
शुभमस्तु !
23.12.2025●4.00प०मा०
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