774/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
रोज ही
तारीख बदले
वर्ष में बदले कलेंडर।
आदमी तो
आदमी है
क्या बदलना
एक पत्थर की
शिला का
क्या पिघलना
वक्त उड़ता
जा रहा
ज्यों हो लवेंडर।
जिंदगी की
हर घड़ी
जब टिकटिकाए
जिंदगी हो
और छोटी
घटती जाए
क्या पता
कब जग उठे
साँसों का बवंडर।
जनवरी
फिर फरवरी
आती रहेंगीं
मार्च भी
अप्रैल भी
अपनी कहेंगीं
आएगा नम्बर
दिसम्बर का कभी फिर
रफूचक्कर सिलिण्डर।
शुभमस्तु !
23.12.2025●3.00प०मा०
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