762/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कल कहाँ था
आज हूँ जिस ठौर
कल का पता क्या ?
पीछे घुमाकर दृष्टि
जब मैं देखता हूँ
दिखता जो बीता
हाथ डाला
जिस घड़े में
निपट रीता
साथ मैं
जिनके चला
उनका पता क्या ?
आँधियों तूफान ने
सुदृढ़ बनाया
जो खड़ा हूँ
पतन ने
ऊपर चढ़ाया
गिरि पर चढ़ा हूँ
आरोह अवरोहण
लगा रहता नियति में
भविष्यत का पता क्या?
जन्म देकर नाविकों ने
मुझे पाला
जनक - जननी थे हमारे
राह का दीपक दिखाया
ज्योति भर दी
तम रहा तट के किनारे
क्या पता कब तक चलेगा
कारवाँ ये
उस कारवाँ की नियति का भी पता क्या?
शुभमस्तु !
21.12.2025● 4.45प०मा०
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