सोमवार, 22 दिसंबर 2025

ठंड पूस की [ नवगीत ]

 757/2025


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ठंड पूस की

गर्म चाय का

अपना अलग रुआब।


सुबह-सुबह

कप भाप छोड़ता

महका भूरी चाय

जलदी मुझे

लगा होठों से

ठंड लग रही हाय

सिप- सिप कर

पी धीरे -धीरे

तनिक नहीं दे ताब।


सँग में यदि हैं

गर्म पकौड़ी

फिर देखो क्या ठाठ

रहें सरकते

मुख ग्रीवा में

चार -चार भी आठ

ऊष्मा का

सर्जन भीतर हो

कोई नहीं लुकाव।


बड़े -बड़े

मसले तय होते

सजी चाय की मेज

खबरी आकर

सुना रहे हैं

खबर सनसनीखेज

जब तक चाय

महकती महफ़िल

चले चाय में नाव।


शुभमस्तु !


21.12.2025● 10.30 आ०मा०

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