757/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
ठंड पूस की
गर्म चाय का
अपना अलग रुआब।
सुबह-सुबह
कप भाप छोड़ता
महका भूरी चाय
जलदी मुझे
लगा होठों से
ठंड लग रही हाय
सिप- सिप कर
पी धीरे -धीरे
तनिक नहीं दे ताब।
सँग में यदि हैं
गर्म पकौड़ी
फिर देखो क्या ठाठ
रहें सरकते
मुख ग्रीवा में
चार -चार भी आठ
ऊष्मा का
सर्जन भीतर हो
कोई नहीं लुकाव।
बड़े -बड़े
मसले तय होते
सजी चाय की मेज
खबरी आकर
सुना रहे हैं
खबर सनसनीखेज
जब तक चाय
महकती महफ़िल
चले चाय में नाव।
शुभमस्तु !
21.12.2025● 10.30 आ०मा०
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